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Dr J P Baghel

Tragedy

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Dr J P Baghel

Tragedy

भ्रष्टा... चार...भ्रष्टा... चार...

भ्रष्टा... चार...भ्रष्टा... चार...

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छियानबे पूरे बदहाल 

मस्ताने हैं केवल चार, 

शासक, लेखक, धनिया सेठ 

और धर्म के ठेकेदार ।

भ्रष्टा...चार...भ्रष्टा...चार... 


शासक का विधि ही से नाता 

सुविधा युक्त विधान बनाता, 

दंडित होती प्रजा स्वयम् सब 

अपराधों से मुक्त विधाता ।

तोड़ मोड़ व्याख्या करने का 

शासक ही को है अधिकार !

भ्रष्टा...चार...भ्रष्टा...चार... 


लेखक हर रहस्य का ज्ञाता 

जो लिख दे प्रमाण बन जाता, 

चाहत धन की, यश की, सच से 

लेख लेख पर आंख चुराता ।

दबा झूठ के अट्टहास में 

शुद्ध सत्य का हाहाकार !

भ्रष्टा...चार...भ्रष्टा...चार... 


गोपन-कुशल गुप्त ही धनिया 

देश बिगाड़ बन रहा बनिया,

मजदूरों के रिक्त पेट पर 

सेठों की डकार की ध्वनियां ।

जारी झूठ कपट छल चोरी 

जारी लाशों पर व्यापार !

भ्रष्टा...चार...भ्रष्टा...चार... 


धर्म हुआ मिथकों का धंधा 

श्रद्धा-भक्ति, अनुकरण अन्धा,

सृजन, बुद्धि, मौलिक विवेक पर 

धर्माधीश कस रहे फंदा ।

प्रेम शांति के लिए धर्मपति

खुलकर भांज रहे हथियार !

भ्रष्टा...चार...भ्रष्टा...चार... 


छियानबे पूरे बदहाल 

मस्ताने हैं केवल चार, 

शासक, लेखक, धनिया सेठ 

और धर्म के ठेकेदार ।

भ्रष्टा...चार...भ्रष्टा...चार...


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