भ्रष्टा... चार...भ्रष्टा... चार...
भ्रष्टा... चार...भ्रष्टा... चार...
छियानबे पूरे बदहाल
मस्ताने हैं केवल चार,
शासक, लेखक, धनिया सेठ
और धर्म के ठेकेदार ।
भ्रष्टा...चार...भ्रष्टा...चार...
शासक का विधि ही से नाता
सुविधा युक्त विधान बनाता,
दंडित होती प्रजा स्वयम् सब
अपराधों से मुक्त विधाता ।
तोड़ मोड़ व्याख्या करने का
शासक ही को है अधिकार !
भ्रष्टा...चार...भ्रष्टा...चार...
लेखक हर रहस्य का ज्ञाता
जो लिख दे प्रमाण बन जाता,
चाहत धन की, यश की, सच से
लेख लेख पर आंख चुराता ।
दबा झूठ के अट्टहास में
शुद्ध सत्य का हाहाकार !
भ्रष्टा...चार...भ्रष्टा...चार...
गोपन-कुशल गुप्त ही धनिया
देश बिगाड़ बन रहा बनिया,
मजदूरों के रिक्त पेट पर
सेठों की डकार की ध्वनियां ।
जारी झूठ कपट छल चोरी
जारी लाशों पर व्यापार !
भ्रष्टा...चार...भ्रष्टा...चार...
धर्म हुआ मिथकों का धंधा
श्रद्धा-भक्ति, अनुकरण अन्धा,
सृजन, बुद्धि, मौलिक विवेक पर
धर्माधीश कस रहे फंदा ।
प्रेम शांति के लिए धर्मपति
खुलकर भांज रहे हथियार !
भ्रष्टा...चार...भ्रष्टा...चार...
छियानबे पूरे बदहाल
मस्ताने हैं केवल चार,
शासक, लेखक, धनिया सेठ
और धर्म के ठेकेदार ।
भ्रष्टा...चार...भ्रष्टा...चार...
