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Juhi Chohan

Tragedy

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Juhi Chohan

Tragedy

क्या कहें ? कि अब तो, सारे लफ्ज़, धुंधले पड़ गए हैं!

क्या कहें ? कि अब तो, सारे लफ्ज़, धुंधले पड़ गए हैं!

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क्या कहें ? कि अब तो, सारे लफ्ज़, धुंधले पड़  गए हैं!

कुछ बचा अगर है तो बस,

इन आँखों से अश्रुओं की बरखा जो कभी रूकती नहीं,

अपने ही अपनो से, ऐसे अल्फ़ाज़ सुनके, मानो पैरों तले, ज़मीन हट गयी है !

क्या कहें ? कि अब तो, सारे लफ्ज़, धुंधले पड गए हैं!

क्या कहे? कि अब जीवन का हर पन्ना, रेख्ता हुआ सा नज़र आता है,

कभी ज़िन्दगी उदासी का दरिया लगती है,तो कभी तिश्नगी नज़र आती है!

जो दर्द होता है,उसे लफ़्ज़ों में बयाँ, करना मुश्किल हो गया है,

बस इन सुरमई अँखियों, में, जो अश्रुओं का गहरा समन्दर है, 

उससे पता लगता है कि,पूरा दरिया सूख जाएगा लेकिन इन सुरमयी अँखियों का पानी नहीं रुकेगा!

क्या कहे? कि अब तो सारे लफ्ज़ धुंधले पड़ गए हैं!

           


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