STORYMIRROR

Nandita Tanuja

Tragedy Others

3  

Nandita Tanuja

Tragedy Others

रुख़सत

रुख़सत

1 min
197

कुछ दिन पहले किसी ने एक फ़ायदे की सलाह दी थी...

यूँ समझ लो कि अपने शातिर दिमाग से खुद को बचाते हुए राह दी थी...

अजीब सी वो शख़्स उस वक़्त वो वक्त से अंजान थी...

मेरे दिल के दर्द से खुश वो खुद के लिए ईमान थी...

कितनी खुश थी वो सब देखकर इश्क़ के ईमान में वो बेईमान थी...

मुझे रुख़सत किया था ये कहकर वक़्त का कमाल देख लेना

मैं हूँ यही तुम देख लेना खामोश लब से वफ़ा लौटी थी...

अश्कों में छुपी मोहब्बत की आन थी...

रुख़सत हुए थे अपने दलीलों के साथ सब्र मेरा,

और मेरी रूह परेशान थी...

डर ये नहीं था... कि कुछ छीन रहा... हाँ, विश्वास में सब टूट रहा

इश्क़ के नाम इश्क़ छूट रहा... दर्द ही इश्क़ की पहचान बनी

शायद मेरी रूह में जान थी... वो जिनका दम्भ ले रही थी...

रब ने उन्हें इश्क़ की पहचान दी फ़र्क उन्हें भी दिखे शायद

वक़्त के साथ... .बेईमानी को रुख़सत किया

सब्र-ए-इश्क़ मेरी रूह की जान बनी... !!



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy