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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract Tragedy

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract Tragedy

भरोसे की किताब

भरोसे की किताब

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आज भरोसे की वो किताब बदल गईआज पत्थरों की वो ईमारत बदल गई

लिखे थे हमने जो हृदय पे अमित नाम,आज वो पूरी की पूरी स्याही बदल गई


किसे कुछ कहने का काम नही रहा है,आज वो आईने की परछाई बदल गई

आज भरोसे की वो किताब बदल गईआज आंखों की वो शर्मोहया बदल गई


आज टूटे-टूटे से हो गये है वो पर्वत भी,जिनसे कभी बादलों की दिशा बदल गई

लोगों के मन में भरे आज पाप इतने की,आज अंधेरी रात की कालिमा बदल गई


आजकल अंधेरे का ही उजाला होता है,आज अंधेरे की भी वो जात बदल गई

आज भरोसे की वो किताब बदल गईआज लबों की वो मुस्कान बदल गई


हंसते है लोग केवल ऊपर के मन से,आज हंसने वाली वो सूरत बदल गई

पर तुझे नही बदलना है कभी साखी,चाहे जिंदगी तेरी धूँ-धूँ कर जल गई


न बदलनेवालों से,अडिग रहनेवालों से, यह पूरी की पूरी दुनिया ही बदल गई।


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