भारत मां की गाथा
भारत मां की गाथा
आज अपने कलम बाण से
कथा पुनः दुहराती हूं
भारत माॅ की संतति हूं
गाथा पुरानी गाती हूं।
हंसता बसता देश हमारा
राम राज्य की नगरी था
बुद्ध महावीर की जन्मभूमि
यह स्वर्ग से सुन्दर डगरी था।
धन दौलत के दृष्टिकोण से
दुनियां में जाना जाता था
देश विदेशों की नजरों में
सोने की चिड़िया कहलाता था।
खुशहाली को देख विदेशी
मन ही मन से जलते थे
गजनी गोरी लंग तैमूर
आकर आतंक मचाते थे।
अब समय समय के लूट पाट से
भारत बना बेचारा
अवसर देख फिरंगी ने
व्यापार सहारा मांगा।
छल प्रपंच के इस अन्तर्मन को
किसी ने न अन्दर झांका
स्वीकार कर इस विचार को
देकर अनुमति बसाया।
अनुमति पाकर पहले
एक फिरंगी आया
कदम कदम को जोड़ उन्होंने
साम्राज्य विस्तार बढ़ाया।
पाकर राज्य फिरंगी ने
खूब कहर मचाया
अन्तिम सम्राट जफर का
अन्त सफ़र अब आया।
भारतवासी के गलत कदम से
स्थिति अब चरमराया
त्राहिमाम मची जन-जन में
जनविद्रोह अब छाया।
दिन प्रतिदिन लुट रहे देशवासी
गरीबी उन्हें अब घेरा
तभी सन् संतावन में
आन्दोलन उन्होंने छेड़ा।
तात्या,नाना,वीरकुंवर अब
सभी दिशा से आये
टीपू और लक्ष्मीबाई भी
उनके संग ही आये।
चमक उठी तलवार जब उनकी
देख फिरंगी थर्राये
टीपू व लक्ष्मीबाई के डर से
सदियों तक घबराए।
लेकिन फिरंगी राजनीति ने
सबको लपेट गिराया
फूट डालकर जनजन में
जनविद्रोह कराया।
अनेकता के निर्बलता से
विकट काल अब छाया
जंग फिरंगी जीत लिया
अधिकार पुनः जमाया।
भारत माॅ को चंगुल में
उसने अब फॅसाया
त्राहित्राहि मची जन जन में
अराजकता अब घेरा।
दुखद स्थिति की इस घड़ी में
था अब सभी को जीना
तभी भारत मां के धरती पर
पैदा लिया महात्मा।
अवतार लिये गांधी ,टैगोर
संग आजाद भगत सिंह आये
नेहरू ,पटेल ,सुभाष अबुल संग
लाल बाल भी छाये।
जंग छिड़ी फिरंगी संग
क्रांतिकारी कहर मचाया
अपने देश की रक्षा खातिर
ले तलवार ललकारा।
सरफ़रोशी की तमन्ना
थी अब उनके दिल में
देखना था जोर कितना
बाजुए कातिल में।
हर जोर जुल्म के टक्कर में
था संघर्ष उनका नारा
देख फिरंगी भाॅप गये
अब रहना नहीं गॅवारा।
क्रोधित हुए फिरंगी अब
मार काट मचाया
जालियावाला कांड कराकर
हृदयाघात पहुंचाया।
इस क्रूर हरकत से भी
फिरंगी बाज न आया
भगत सिंह ,सुखदेव ,राजगुरू
मृत्यु दंड को पाया।
वह संपूर्ण जगत से निंदित हो
हुआ लोक समाज में कलंकित
हृदय नहीं वह पत्थर था
जिसने कर्म किया वह घृणित।
अब टूट चुके थे भारतवासी
गुस्सा फुटकर उभरा
चौरी-चौरा कांड कराकर
दूर निशाना साधा।
इस बात से खिन्न महात्मा
अन्न जल को त्यागा
सत्य अहिंसा के पुजारी को
हिंसा कब भाया।
जैसे तैसे मिलकर सबने
महात्मा को मनाया
एकजुट हो भारतवासी
असहयोग आन्दोलन छेड़ा।
स्वतंत्रता के ध्वज ले महात्मा
भर हुंकार दहाड़ा
दांडी यात्रा कर उन्होंने
कलेवर अपना दिखाया।
अपने कर्म के बलबूते से
जन्म का अर्थ समझाया
समझे इसको व्यर्थ न कोई
आत्मविश्वास जगाया।
सत्य अहिंसा के पुजारी
श्रम को हथियार बनाया
अपने हाथों वस्त्र बनाकर
कुटीर उद्योग चलाया।
साफ स्वच्छता के खातिर
स्वच्छ अभियान चलाया
जन को जन से जोड़ने का
माध्यम क्या अपनाया।
अहिंसा का मूल मंत्र अब
था जनहित में जारी
अहिंसा व हिंसा के तराजू में
था सत्य अहिंसा भारी।
आन्दोलन भारत छोड़ो का
गांधी ने अब छेड़ा
फिरंगी भारत छोड़ो
था जगह जगह का नारा।
बगावत की इस तूफां से
था अब क्या उसका बचना
घिर गया वह तूफानो से
था अब छोड़ के भारत जाना।
लेकिन बगावत की आंधी में भी
पशुत्व उसका जागा
हिन्दू मुस्लिम बैर कराकर
कूटनीति चलाया।
फिरंगी के इस कूटनीति से
फूटनीति गहराया
डिगा विश्वास महात्मा का
आत्मविश्वास नहीं डगमगाया।
पाक अलग हुआ भारत से
कष्ट असीम तड़पाया
लेकिन सुबह पन्द्रह अगस्त
सौभाग्य लेकर आया।
मिली आजादी भारत को
ऐसा शुभ दिन आया
लहर उठा राष्ट्रध्वज
था अब जय हिन्द का नारा
जय हिन्द का नारा,
जय हिन्द का नारा।
जय हिन्द।
