Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer
Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer

Navin Madheshiya

Tragedy

2  

Navin Madheshiya

Tragedy

बेरोजगार

बेरोजगार

1 min
114


जहां दिन होती बिस्तर पर 

रात होती मोबाइल में

दिन भर कटती है बस 

किताबों की आड़ में 

मुरझाया मुरझाया सा चेहरा है 

दिल में दबी है हसरतें  

दिन भर ताने सुनता हूँ

पर पैर है आसमान में

दिन भर ख़्वाब टूटते बुनते हैं 

पर चलती हैं उम्मीदों की सांसें

क्योंकि मैं स्वयं एक ख़्वाब हूं

हां मैं बेरोजगार हूं 

हां मैं ही बेरोजगार हूं               



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy