बेइन्तहा प्यार
बेइन्तहा प्यार
वो तो उनकी माँ की पसन्द थी
उन्हें पसन्द कहाँ आयी थी
फिर भी संस्कारों के चलते
रिश्ते की डोर निभाई थी
पत्नी ने भी बड़े प्यार से
गृहस्थी सुन्दर बसाई थी
उनके पूर्ण समर्पण ने
मन में जगह बनाई थी
कब वो इतना भाने लगीं
ये खुद भी नहीं समझ पाये
कल तक माँगा सभी हाथ में
अब हाथ बँटाते चले जायें
अरे बैठो तुम थक जाओगी
कुछ मुझे भी हाथ हिलाने दो
आज सिरदर्द तुम्हारे है
खाना बाहर से मँगाने दो
जब कमर दर्द से आह भरें
वह बाम लिये तैयार खड़े
जरा जोर से जब भी खास दिया
वह थर्मामीटर नाप रहे
कब बेइंतहा प्यार हुआ
यह वह भी नहीं समझ पाये
दिल अक्सर धकधक करता है
बस ऊपर से नहीं जतलायें
साँसों की डोरी टूटे नहीं
यह साथ कभी छूटे भी नहीं
इतना तो असर दुआओं में हो
मेरा प्यार मुझसे रुठे भी नहीं

