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Writer Rajni Sharma

Drama

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Writer Rajni Sharma

Drama

बचपन

बचपन

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435

मुझे अगर गुजरे वक्त में जाने का मौका मिले 

तो मैं अपने उस बचपन में जाना चाहूँगी

जहाँ बिना किसी फ़िक्र के आजाद

होकर मैं अपनी ज़िन्दगी जीती थी।


जिस बचपन में मेरी माँ मुझे अपनी

गोद में लेकर सुलाया करती थी।

 सुबह स्कूल के लिए तैयार करती,

टिफिन पैक करती और बैग लेकर

स्कूल बस तक छोड़ने जाती थी। 


 मैं अपने उस बचपन को फिर से जीना चाहूँगी

जब हमारे लिए स्कूल का काम करना ही

हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी था।

जहाँ स्कूल में छीन कर हम

एक - दूसरे का टिफ़िन खाते थे

छोटी-छोटी बातों के लिए

टीचर को शिकायत लगाते थे।


 जहाँ Test के डर से टीचर ना आने की

भगवान से प्रार्थना करते थे।

मॉर्निंग prayer के समय एक दूजे को धक्का देना,

फिर किसी और पर इल्जाम लगाते थे

 एक दूसरे की कॉपी पर funny कार्टूंस बनाना,

इशारों में बात करना

ये भी मानो बचपन का एक अलग ही टैलेंट होता था।


 सभी टीचर के अजीब से बड़े funny नाम निकालते थे

छोटे-छोटे कंधों पर भारी - भरकम बैग का

वजन मानो एक अलग ही मेहनत करते थे

 फिर शाम को दोस्तों के साथ खेलना-कूदना,

आज़ाद घूमना भी एक अलग नजारा होता था।


हाँ मैं अपने उस बचपन को फिर से जीना चाहूँगी

जब मैं अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी

अपनी माँ पर निर्भर रहती थी।

अपनी छोटी-छोटी आँखों में

बड़े-बड़े सपनों को संजोती थी। 


मैं अपने उस बचपन को फिर से जीना चाहूँगी

जिसमें दुनिया की बड़ी-बड़ी बातों से बेखबर मैं

अपनी मस्ती की एक अलग ही दुनिया में मग्न रहती थी। 

जिसमें कोई परेशानी नहीं सिर्फ़ मेरा बचपना था

मैं उस बचपन को फिर जीना चाहूँगी।


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