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मिली साहा

Abstract Children Stories

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मिली साहा

Abstract Children Stories

बचपन की वो दोस्ती

बचपन की वो दोस्ती

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बचपन की दोस्ती यारी

खूबसूरत फूलों की थी क्यारी

मतलब की इस दुनिया में सच्ची थी 

वो प्यारी-प्यारी सी निश्चल दोस्ती हमारी।।


ना धर्म जानते थे एक दूजे का

और ना जानते थे कोई जात-पात

दोस्ती का मतलब भी नहीं पता था जब

तब से थी ये हर धर्म से बेखबर दोस्ती हमारी।।


कभी रूठते थे कभी मनाते थे

चहकते थे हम मस्त पंछियों की तरह

बेफिक्री की हवा में गुनगुनाते भंवरों की तरह

सुरमय संगीत सी थी वो बचपन की दोस्ती हमारी।।


साथ स्कूल जाना साथ में खेलना

वक्त की कभी कोई परवाह न करना

बेवजह मुस्कुराती, खिलखिलाती थी ज़िंदगी

समझदारी की दुनिया से कोसों दूर थी दोस्ती हमारी।।


न इंटरनेट का वो ज़माना था

और न किसी के पास मोबाइल था

हालचाल पूछने बेधड़क पहुंच जाते थे हमेशा

एक दूजे के घर ऐसी थी बचपन की दोस्ती हमारी।।


लड़ते, झगड़ते थे कई बार हम

पर मना लेते थे एक दूजे को हरदम

पल में ही फूट जाते थे गुस्से के बादल सारे

बारिश की बूंदों सी थी बचपन की दोस्ती हमारी।।


वो बचपन की दोस्ती अब भी बरकरार है,

मिलते नहीं एक दूसरे से पर जुड़े मन के तार हैं

बातें होती हैं कम पर एहसास तो अभी भी वही है

बचपन से आज तक हर दरार से दूर है दोस्ती हमारी।।



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