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Nandini Upadhyay

Abstract


5.0  

Nandini Upadhyay

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बारिश की बूंदे

बारिश की बूंदे

1 min 273 1 min 273

ये बारिश की बूंदे मुझे बहुत लुभाती ,

कितनी चंचल ,चपला, शरारती है ।

धरा पर यहाँ वहाँ फुदकती रहती ,

कितनी निश्छल, निर्मल, है ।


झरोखे से मैं अक्सर इन्हें देखती रहती हूँ ,

बरसात के मौसम में, अठखेली करते हुये ।

कितनी अच्छा जीवन है इनका,

इतनी निर्भीक स्वच्छंदता से बहती है।


न कोई रोक टोक, न ही किसी का सुनना,

अपनी ही धुन में चलना, नये ख्वाब बुनना।

यह हिमाकत मेह की बूंदों में ही होती है,

बेबस नारी ऐसा बिल्कुल नही कर पाती ।


वो तो बस समाज की बेड़ियो में जकड़ी हुई,

अपनी दुर्दशा पर रोती, सिसकती हुई ,


मर्यादा में बँधी हुई, रिस्तो से जुड़कर ,

माँ, बहन, बेटी, पत्नी, का फर्ज निभाती है

तभी तो ये बारिश की बूंदे मुझे बहुत लुभाती है,



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