बादल तुम थोड़ा ठहर जाते
बादल तुम थोड़ा ठहर जाते
बादल ! तुम्हे इतना जल्दी लौट जाना था
तो तुम आये ही क्यों ?
बादल ! तुम थोड़ा और ठहर जाते
तो अच्छा होता ।
बिन भीगे कोनों में थोड़ा और बरस जाते
तो अच्छा होता ।
बारिशों में भीगे मन को थोड़ा और भिगोते
तब तुम जाते ।
भीगी लटों को थोड़ा सूख सँवर जाने देते
तब तुम जाते ।
फटे मेघों से उधेड़े जीवन को सिल जाते
तब तुम जाते ।
विरह गीत को पूरा सुन जाते
तब तुम जाते ।
लहलहाते धान के नरम दानों को सहला जाते
तब तुम जाते ।
बादल तुम थोड़ा और ठहर जाते
खिलती कलियों ,खिलते गुलाबों को मुस्कराते देखते
तब तुम जाते तो अच्छा होता।

