अथाह प्रेम का परिणाम?
अथाह प्रेम का परिणाम?
माना धृतराष्ट्र थे अंधे,
लेकिन गांधारी ने आंखों पर पट्टी क्यों बांधी?
उसने भी धृतराष्ट्र के जैसे संसार को देखने से किया था इंकार।
ऐसा करने से दोनों अंधे हो गए।
यदि वह दूसरा विकल्प चुनती।
तो दिखा सकती थी अपनी आंखों से धृतराष्ट्र को भी संसार।
ऐसा करने से कम हो जाता क्या उसका प्यार?
इस बारे में पाठकगण आपका क्या है विचार?
जब दो विकल्पों में से एक ही विकल्प हो चुनना।
तो बेहतर है नकारात्मक की जगह
सकारात्मक को चुनना।
सकारात्मक होते तो शायद महाभारत ही ना होता।
दोनों ज्यादा ही सुखी रह सकते थे क्योंकि एक की आंखों से
दोनों ही संसार देख सकते थे।
गांधारी देख सकती थी अपने पुत्रों के चेहरे पर आते जाते हर भाव
तब आसानी से ना चलता शकुनि का कोई भी दाव।
अपने घर संसार का वह संभाल खुद करती।
राजा धृतराष्ट्र के आंखों की ज्योति वह खुद बनती।
शायद तब महाभारत की जरूरत ही ना रहती।
यदि उसने अपने घर संसार की नींव सकारात्मक भाव से रखी होती।
माना कुछ लोगों को यह बलिदान भी लगता होगा।
गांधारी का आंखों पर पट्टी बांधना
उसके अथाह प्रेम का परिणाम भी लगता होगा।
लेकिन क्या जरूरत थी किसी को कुछ भी साबित करने की।
बस सिर्फ इतना ही जरूरी था कि जो जैसा है उसे वैसा ही रहने देती।
महाभारत में गांधारी का चरित्र बहुत हैरान करता है!
आंखों पर पट्टी बांधने का उसका निर्णय बहुत ही परेशान करता है।
माना धृतराष्ट्र थे अंधे,
लेकिन गांधारी ने आंखों पर पट्टी क्यों बांधी ?
