अस्वीकार है मुझे
अस्वीकार है मुझे
हाँ, अस्वीकार हैं मुझे,
तेरे दिए हर जख्म,
जो दुःख के सागर में,
मुझे अब तक ले जाते रहे।
मैं सिसकती रही,रोती रही,
अपना प्रारब्ध मान,
सब सहती रही।
पर अब नही,
और नही,
चाहे तुम जितना,
रूप बदल लो,
कभो नारी,
कभी पुरुष का रूप धर लो।
अब मुझे न सता पाओगे,
न दुख के दरिया में,
डुबो पाओगे।
मानती हूं,
मुझे रखा तुमने बंधन में,
युगों युगों तक क्रंदन में,
कभी नारी होकर भी,
एक नारी को सताया,
कभी मिथ्य पुरुषत्व ने,
मुझे अबला कह रुलाया।
बांधा भी कुरीतियों ने,
बंद भी किया पिजरों में,
कभी लाद दिया गहनों में,
घर की शोभा कह,
लगा दी लगाम वाणी को,
कभी लोक मर्यादा बता,
बना दी परतंत्रता की बेड़ी।
और आज तो,
हद ही कर दी तुमने,
मुझे एक वस्तु बना,
पूरी करते रहे अपनी अभिलाषा,
एक उपभोग की वस्तु बना डाला,
हर तरह बस शोषण कर डाला,
पर नही अब और नही,
मैं अब न सहूंगी,
मुझे अब ज्ञात है,
तुम न मुझे,दुख दे सकते हो,
और न सुख,
न तुम मेरे भाग्य विधाता तब थे
और न हो अब,
मैं एक स्वतंत्र परिंदा हूँ,
जिसका पूरा नील गगन हैं,
मेरा अंतस ही मेरी,
खुशी का स्रोत्र हैं,
आभूषण नही और तुम नही,
एक नारी हूँ,
मुझसे तुम हो,
तुझसे तो मैं बिल्कुल भी नही।
आज लौटा रही हु,
वह सारी बंदिशें,
जो मुझे मेरी नारीत्व से दूर ले जाती हैं,
मुझे सोने के पिजरे का परिंदा बनाती हैं,
जा रही हूं मैं,
उस नील गगन की उड़ान को,
जो न केवल मेरी विजय हैं,
वरन तेरी भी विजय हैं,
शायद समझोगे तुम भी,
एक दिन तो जरूर,
कि कुरीतियां नही जरूरी,
नारी का अस्तित्व जरूरी है।।
