Jalpa lalani 'Zoya'
Action Inspirational
वापस नहीं आता जो वक़्त चला गया है
बदलाव लाने का अब वक़्त आ गया है
नामुमकिन है वक़्त से आगे निकलना
वक़्त के साथ न चला उसे रोका गया है
कोशिशों से हर हालात को है बदलना
हुई है हार जब तक़दीर पे छोड़ा गया है।
किताब-ए-ज़िन्द...
राब्ता
तिश्नगी-ए-क़ुर...
दिलनशीं
चाहत तेरी
पास आओ कभी
ज़ुल्फ़ का साया
हमसा कहाँ मिल...
तू है गीत मेर...
नाउम्मीदी में...
अपने अस्तित्व बचाने को, हथियार उठाना पड़ता है। अपने अस्तित्व बचाने को, हथियार उठाना पड़ता है।
मां भारती के वीर सपूतों को शत-शत प्रणाम। मां भारती के वीर सपूतों को शत-शत प्रणाम।
यहाँ से उठ गया दाना पानी लो अब हम तो सफ़र करते हैं। यहाँ से उठ गया दाना पानी लो अब हम तो सफ़र करते हैं।
तो जाति, धर्म कहाँ से आया ? वैसे ही आँसू का कोई धर्म नहीं। तो जाति, धर्म कहाँ से आया ? वैसे ही आँसू का कोई धर्म नहीं।
खौफनाक तूफानों से जान को बचाये रखना खौफनाक तूफानों से जान को बचाये रखना
खामोशी को तोड़ते हैं मुस्कराहट चेहरे पर लाते हैं हम। खामोशी को तोड़ते हैं मुस्कराहट चेहरे पर लाते हैं हम।
मैं भावनाओ की रीढ़ हूं, मैं एक शहीद हूं। मैं भावनाओ की रीढ़ हूं, मैं एक शहीद हूं।
ये बहरों की बस्ती है, चिल्लाऊं किस पे ये अच्छा है मौका, तू मुंह को छुपा ले ये बहरों की बस्ती है, चिल्लाऊं किस पे ये अच्छा है मौका, तू मुंह को छुपा ले
तेरे स्मारक होगी भारतवासियों के दिल में। तेरे स्मारक होगी भारतवासियों के दिल में।
अपने मित्रों के मनमंदिर में प्रेम का दीप जलना होगा ! अपने मित्रों के मनमंदिर में प्रेम का दीप जलना होगा !
कोरोना से न मानेंगे हार, हम फिर पकड़ेंगे रफ्तार। कोरोना से न मानेंगे हार, हम फिर पकड़ेंगे रफ्तार।
जिस दिन मौन टूटा प्रलय का बुलावा खड़ा होगा तुम्हारे द्वार पर। जिस दिन मौन टूटा प्रलय का बुलावा खड़ा होगा तुम्हारे द्वार पर।
माँ भारती के वीर सपूत, सनातन धर्म की आन-बान-शान, माँ भारती के वीर सपूत, सनातन धर्म की आन-बान-शान,
कर्म – खड्ग से भाग्य रक्ष का, चाक करूं अब सीना अनुचर, अनुगामी बन कर,अब और नहीं है जीना कर्म – खड्ग से भाग्य रक्ष का, चाक करूं अब सीना अनुचर, अनुगामी बन कर,अब और नही...
भारत जल्द ही कोरोनावायरस से मुक्त हो जाएं। भारत जल्द ही कोरोनावायरस से मुक्त हो जाएं।
कविता : मरीना त्स्वेताएवा अनुवाद: आ. चारुमति रामदास कविता : मरीना त्स्वेताएवा अनुवाद: आ. चारुमति रामदास
गया प्रभात, गई दुपहरिया हुई सुबह से शाम मन तू भजेगा कब, हरि नाम गया प्रभात, गई दुपहरिया हुई सुबह से शाम मन तू भजेगा कब, हरि नाम
ना भूले हम उन महा वीरों को, जो रहे हमारे कर्णधार हैं। ना भूले हम उन महा वीरों को, जो रहे हमारे कर्णधार हैं।
कीचड़ को कीचड़ ही भाता फिर वो पद्म कहां से लाता किन्तु पद्म की ऐसी धृति है कुंठित कीचड़ में उग आत... कीचड़ को कीचड़ ही भाता फिर वो पद्म कहां से लाता किन्तु पद्म की ऐसी धृति है कु...
गुजरे हुए लम्हों की किताब होगी खास। गुजरे हुए लम्हों की किताब होगी खास।