जाग अरे !
जाग अरे !
जाग अरे..
रचनाकार : डॉ जे पी बघेल, मुंबई
दिख रहे समय की आहट में
बरबादी के आसार मुझे,
वे दिखा रहे हैं सपनों में,
रंगीनी और बहार तुझे !
चल रहे कहीं पर तीर
इशारे किए जा रहे और कहीं
सहमी घबराई मानवता,
मिलता न सुरक्षित ठौर कहीं
कर रही धर्म का नशा कराकर
संज्ञहीन सरकार तुझे !
जब भी तूने रोटी मांगी
कह दिया उन्होंने राम रटो
हिस्से की बात उठाई तो
धकियाया कहकर दूर हटो
जब उठी गले में चीख एक
तो बता दिया गद्दार तुझे !
डर और वंदनाएं उनकी
स्वर चौतरफा उनकी जय के
जग उठा दम्भ, नारे उछले,
बन गए घोर वाहक भय के
उठते दिख रहे गुलामी के
फिर से घनघोर गुबार मुझे !
हर और प्रचार झूठ का है
सच बुरी तरह आतंकित है
हे युवक, देख ! हो सावधान !
तू ही अब अधिक प्रवंचित है
सुन, मिला हुआ है संविधान में
जीने का अधिकार तुझे !
तुझको असमर्थ बनाने की
उनकी कोशिश है, जाग अरे !
चल, हुआ जरूरी आज
लगा उन षड्यंत्रों में आग अरे !
अब चूका तो फिर नहीं मिलेगा
अवसर अगली बार तुझे !
वे दिखा रहे हैं सपनों में
रंगीनी और बहार तुझे,
दिख रहे समय की आहट में
बरबादी के आसार मुझे !
