STORYMIRROR

Krishna Khatri

Tragedy

4  

Krishna Khatri

Tragedy

अपनी तलाश में!

अपनी तलाश में!

2 mins
490

अक्सर अपनी तलाश में 

निकलता रहा हूं 

अपने ही जनाजे को लेकर 

आधे में मगर लौट आया हूं 


हर बार किसी बहाने को लेकर 

इस उम्मीद पे था कि 

कोई तो राह बताएगा 

मगर जो भी मिला 

नावाकिफ ही रहा


मेरे हालात को लेकर 

देख ढंग जमाने के 

मैं उलझा ही रहा

जाने कितने सवालों को लेकर 


हैरां भी रहा हूं अक्सर 

जमाने के,

बदगुमां जवाबों को लेकर 

हीर-रांझा न मजनू-लैला 

बन के अब न मरे कोई 

इश्क की खातिर 


अब न रही मुमताज 

न रहा शाहेजहां

फिर,

क्या कीजे कोरे ताज को लेकर 


हुस्न के बाजार में 

दिल वालों का मेला है 

चाहत के लिए 

जिस्म की सरगम पर 

सांसों के तार छिड़े हैं-

दिलरुबा को लेकर!


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy