STORYMIRROR

Sheetal Dange

Abstract

4  

Sheetal Dange

Abstract

अपने हो, नहीं मेहमान

अपने हो, नहीं मेहमान

1 min
290

आया है मेहमान नया

नन्हा सा, लिज़लिजा

मन मेरा प्रफुल्लित सा

होगा अब घर खिला खिला।


भंवरे की गुंजन ना भाई

गिलहरी की किट किट से तंग आई

पत्तों में जब हवा सरसराई

और करने बैठी मैं गुड़ाई।


भूरी मिट्टी थी भुर भुरी

भूरी काया में मची थरथरी

एक नहीं हुई उजागर कई

धरती में जैसे मची कंपकंपी।


मिट्टी में उगलोगे प्राण तुम

ठूंठों में भर दोगे जान तुम

रेंगते हुए कर रहे कार्य ये महान तुम

अपने हो, रहना, नहीं मेहमान तुम।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract