अफ़सर बिटियाडॉ. प्रदीप कुमार
अफ़सर बिटियाडॉ. प्रदीप कुमार
"बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ" का नारा बुलंद रहे,
ये फर्ज़ है हमारा, हम सबको सनद रहे,
जब घर की बेटियां पढ़ना शुरू करती हैं,
आने वाली पीढ़ियां उन पर गुरूर करती हैं।
पर एक नज़र डालनी चाहिए उनकी पढ़ाई पर,
हर रोज़ जो वो लड़ती हैं, उन सब लड़ाई पर,
जो बेटियां अपना घर छोड़ दूसरे शहर को जाती हैं,
किराए के कमरे में रहकर, रोज़ फांका फांकती हैं,
मकान-मालिक की बुरी नज़र से खुद को बचाती हैं,
पड़ोस के मनचलों की नजरों से खुद को छुपाती हैं,
क्या सब्जीवाला, क्या दूधवाला?
क्या दुकानदार, क्या रिक्शेवाला?
सब के सब ढूंढते हैं अवसर, बस मौका नहीं पाते हैं।
जो ये सब नहीं सहती हैं, बीच बाज़ार चीखती हैं,
और थप्पड़ लगाती हैं,
भले चार के बीच अकेली हों, पर,
झांसी की रानी बन जाती हैं
इन सब लड़ाइयों से जो लड़कियां जीत जाती हैं,
वही आगे चलकर अफ़सर बिटिया कहलाती हैं।
