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Amit Kumar

Abstract

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Amit Kumar

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अंतर्मन

अंतर्मन

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अंतर्मन को भेदती है

कुछ ख़ामोश बेबाक़ आवाज़ें

कुछ बिना शब्दों की तलहटी से

जुड़ जाते है बिना आवाज़ के मंज़र

कुछ कहकर भी कुछ कह नहीं पाते।


जो चोट महसूस करते है हम

तन्हाई के पहर में

उसका दर्द हमकों सताता है

महफिलों की शमां बनकर

उन्हें कुछ इस तरह घुरना भी

नागवार गुज़रता है बहुतों के दिल को

जिसकी जेब फटी हो।


वही जानता है मुफ़लिसी का सबब

भरी जेबें अक़्सर भूख नही जानती

जो निवालों के इंतज़ार में

गुज़री हो उम्र अक़्सर

बेकारी और लाचारी वो

जवानी ही जानती है।


जिस बचपन की गोद

खिलौनों से खाली हो

वही मिट्टी के कंकर को

हीरा सा महफूज़ रखते है

जिन आंखों ने झूठ का

चश्मा न उतारा हो कभी

वो क्या जान पाएगी

सच बोलने की कीमत।


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