STORYMIRROR

Bhawna Kukreti Pandey

Abstract

4  

Bhawna Kukreti Pandey

Abstract

अंतिम स्पर्श

अंतिम स्पर्श

1 min
434

इन दिनों

अच्छा मुस्कराई हूँ 

छल की दुनिया में पर 

कम, बहुत कम 

मुस्कराई हूँ 

नन्हे पौधों को देख कर।


मचल जा रही हूँ

बेमतलब के सांसारिक

 इनाम पाकर

लेकिन उदास हो रही हूँ

फूटती 

जलधारा को देख कर।


सो अब मैं 

शहर की ओर नहीं, 

जंगल और आसमान की ओर

मुंह कर  जोर जोर से

चीखती-चिल्लाती हूँ।


गोधूलि 

और संध्या के समय 

'मैं 'जी भर कर

रो लेती हूँ 

जो शून्य करता है

मेरा होना।


संभवतः 'मैं'

क्लांत मना हूँ,

क्षुब्ध हो चुकी हूं,

मानव योनि में बार बार

जन्म दिए जाने पर।


अब अंतिम 

एक स्पर्श चाहती हूँ 

चैतन्य का 

होना चाहती हूं एकाकार

उस प्रकृति से 

जो निस्पृह-निर्दोष है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract