अंजाना मन बांध रहा
अंजाना मन बांध रहा
न जाने कौन था--
राज़, राज़ ही रहा,
देखती ही रही हमेशा अपने पीछे,
इक साया---
जब-जब मुड़ के देखा,
कोई नज़र नही आया.
भय था--
स्थान जिसका उत्सुकता ने लिया,
एक काल्पनिक आकर था गढ़ लिया,
सपने उसके देखते-देखते,
साजन घर चल पड़ी,
और अब मैं हो गई बड़ी,
कभी-कभी ध्यान आता था,
मन मचल ही जाता था,
वो मेरा अदृश्य साथी,
द्रौपदी और मीरा का---
कान्हा सा सखा,
बरसों बीत गए--
एक कॉल बेल सुन,
न जाने क्यों? हां! हां!! न जाने क्यों,
दिल----
पता नही धड़कनें भूला था,
या तेज, तेज धड़क आया था,
एक टेलीपैथी, एक बेतार के तार से,
संदेश आया था,
पहचानों तो जरा?
जिसे हर धड़कन पहचानती थी,
वो कैसा अंजाना?
बंद दरवाजे के पार भी,
दिल ने उसे पहचाना.
नही कह सकी, "अंजाना मन क्यों बांध रहा"
मत पूछ सखी, बाहर कौन खड़ा?
एक गोपी मैं, जिसका दिल,
दोहरा रहा था,
ऊधो, मन नाही दस बीस,
एक जाना पहचाना अतिथि आ रहा था।

