अनबूझ पहेली है जिन्दगी
अनबूझ पहेली है जिन्दगी
कल भी जिन्दगी एक अबूझ पहेली थी, आज भी है पहेली,
हर पल एक कशमकश, बड़ी जद्दोजहद, अजीब है पहेली।
रोज रचती रहती यह नई कहानी, कहती नई नई दास्तान,
कोई न समझ पाया इसका सार, रोज इसकी अलग पहचान।
कभी तो यह हँसाती है, कभी खून के आँसू यह रुलाती है,
कभी बहकती, कभी बहकाती, कभी मंद मंद मुस्कुराती है।
कभी चलती यह सीधी सपाट, कभी बनती छैल छबीली है,
कभी गुर्राती कड़वी आवाज़ में, कभी बनती बड़ी सुरीली है।
जाने कब किस करवट बैठती, इस बात का पता नहीं चलता,
किस को कब क्या रंग दिखाती, इसका नहीं कोई अता पता।
कभी बख्स देती दुष्कर्मियों को, कभी देती निर्दोष को सजा,
जाने करके ऐसा अन्याय, क्या आता होगा जीवन को मजा?
एक बार ही मिलती है यह जिन्दगी, इसे ढंग से जीना सीखो,
सिर्फ अपने लिए नहीं, औरों के लिए भी जीवन जीना सीखो।
उलझने बहुत है जीवन में, उन्हें सलीके से सुलझाना सीखो,
अकेले ना कर सको तो, मिलकर उन्हें तुम सुलझाना सीखो।
कभी कभी जब होता हूँ अकेला, पूछता हूँ मैं इस जिन्दगी से,
“क्या रिश्ता है मेरा तुम्हारा, यह तो बता ए जिन्दगी दिल से”।
जिन्दगी तब मुस्कुरा देती, कभी कभी मेरा मुँह भी चिढ़ाती,
“तुम जैसा चाहो वैसी बन जाऊँ”, जिन्दगी मुझे यही बताती।
“मेरा तुम्हारा रिश्ता बड़ा मजबुत, रिश्ता निभा कर तो देखो,
क्यूँ समझते हो मुझे अबूझ पहेली, जरा नजदीक से तो देखो।
जीते हो मेरे संग तुम हर पल, फिर क्यूँ करते रहते रुसवाई,
बना लो मुझे दिल से अपना, आओ करलें हम दोनों कुड़माई”।
सुनी जब मैं ने जिन्दगी की बात, समझ गया मैं इसकी पहेली,
कुछ भी तो अबूझ न था अब, जिन्दगी हुई अब पक्की सहेली।
जाने क्यूँ पैदा कर देतें हम उलझनें, जिन्दगी है बड़ी सुहानी,
सब कुछ सुलझा संवरा सा है, यही तो है जिन्दगी की कहानी।
