" अमृत -धार "
" अमृत -धार "
किसे मैं अब
पत्र लिखूँ ?
इसके दिन तो
चले गए !
कलम स्याही
और दवातें,
लिखना -पढ़ना
भूल गए !!
किन्हें अपनी
बातें बताऊँ ,
सुनने वाले
अब कहाँ रहे !
दूर दराजों में
कहीं बैठे हैं ,
मिलने वाले
अब कहाँ रहे !!
किसी को
कोई जानता नहीं ,
नहीं उसे
कोई पहचानता है !
कहने को
अज़ीज बन गए ,
नहीं दिल के
करीब रहता है !!
सगे संबंधियों के
नंबर पहले ,
सबको कुछ कुछ
याद रहते थे!
जिज्ञासा
किसी की होने पर ,
उनके नंबरों को
वे कहते थे !!
परिवारों के
लोगों का भी ,
अब नंबर हम
जानते नहीं !
उनकी भंगिमा
और इच्छाओं को
हम तो पहचानते नहीं !!
लिखते हैं
मैं स्नातक हूँ ,
पत्र का जवाब
देते नहीं !
जहाँ दिल
जोड़ने की बात है
वहाँ कभी जोड़ते नहीं !!
आत्मीयता का
मंत्र लाओ,
प्यार करना
तुम सीख लो !
सबको अपना
समझ कर,
स्नेह अमृत धार दो !!
