STORYMIRROR

Chaitrali Dhamankar

Abstract

4  

Chaitrali Dhamankar

Abstract

अल्फाज

अल्फाज

1 min
286

सिल दिये आज आपने 

अल्फाज मेरे लब्जों से 

निकल आये आंसू

मेरी बंद आंखों से।


इतनी भी क्या बेकरारी 

बेहेने दो जज्बातों को 

अभी उम्र पड़ी है बाकी 

खुलने दो अरमानों को।


मोब्बत तो हम भी करते है 

इसीलिए तो है जिंदा 

वरना इस बेदर्द जमाने में

अपनेही देते है फांसी का फंदा।


मोहब्बत कैसे हुयी 

पता ही नहीं हमें सनम 

क्यूं हुयी पुछोगे तो 

बतानेमें कम पड़ेगा ये जन्म।


हम तो आपहीके है 

इसकी तो जमानेको भी है खबर 

तोडेगे दम आपहीके बाहों में

वही दफना देना खोदकर कब्र।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract