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Preeti Vaish

Abstract

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Preeti Vaish

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अकेला

अकेला

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आज आवाज न दो मैं अकेला हूँ

कि चुप और उदास हूँ मैं अकेला हूँ।

शब्द चुभते हैं शूल बनकर,

बोलता मौन हूँ,

मैं अकेला हूँ।।


एक कहानी बन गया पढ़ने के लिए,

रख दिया हाशिये पर,

छुप कर बैठा हूँ,

मैं अकेला हूँ।

एक समंदर छुपा लिया है लेकिन

ज्वार बनकर सामने आऊँगा,

मेरी फितरत में छीनना नहीं था,

लहरों से सब लौटाकर जाऊँगा।।


दर्द अथाह सीने में हैं मेरे

पर रख कश्ती को किनारा दूँगा,

मैंने गैरों को समा लिया खुद में

अपनी नदियों को क्यों अलग कर जाऊँगा।

पर मैं अकेला हूँ,

आवाज न देना मुझको।।


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