STORYMIRROR

Chandresh Kumar Chhatlani

Abstract

4  

Chandresh Kumar Chhatlani

Abstract

अजन्मी परी

अजन्मी परी

1 min
301

ना मारो अजन्मी परी को, साँसों का अधिकार दो

बनी है प्रेम की माटी से, उसको भी तो प्यार दो।


पैदा होते ही जो सुख का स्वप्न बन जाते हैं बेटे

सुख देने वाली बेटी को पैदा होते ही ना मार दो।


आज प्रकृति को मानव ने भेद दिया संसार में ।


ना वृक्ष, ना वायु, ना जल बचा इस हाहाकार में ।


थल बारूद भरा है भरी हैं तरंगे वायुमंडल में

किस स्थान पे ईश्वर बचा है अब इस संसार में।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract