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Praveen Gola

Tragedy Inspirational

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Praveen Gola

Tragedy Inspirational

अजीब सी कशमकश है

अजीब सी कशमकश है

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अजीब सी कश्मकश है ,
चारों तरफ दर्द ही बस है ,
कोई समझता नहीं मुझे अब ,
यही उलझन जबरदस्त है |

पति की कहें तो सबसे बेकार ,
बच्चों की कहें तो दो धारी तलवार ,
घरेलू स्त्री की ऐसी परख ,
हर उम्र की ये नई समझ है |

चाहे कितना भी समझा लूँ ,
सबके दिल को अपना बना लूँ ,
तब भी घर में सबको लगता ,
जैसे खोट मुझ में ही सब है |

कभी कभी मैं सच में हार जाती ,
अपनी बर्बादी का जश्न मनाती ,
फिर अगले पल ही मुझको लगता ,
क्यूँ नारी ही हर पल पस्त है ?

नारी जीवन सबसे ज्यादा व्यर्थ ,
उस पर घरेलू होना और भी त्रस्त ,
सारा दिन काम करके भी गर वो ,
थोड़ा संवर जाये तो चिंताग्रस्त है |

बेटी कहती हमारा घर ना बसेगा ,
बेटा कुछ कहने पर तंज कसता ,
पति को चाकरी लगे सबसे प्यारी ,
घुटन भरी ज़िन्दगी पर मेरा हक है |

उम्र ढ़लने लगी है अब तो ,
कितनी बची नहीं पता खुद ही को ,
थोड़े पल खुद के लिये निकालूँ ,
यही सोच कितनी व्यस्त है |

कभी कभी सोचा करती हूँ अकले ,
कि भाग जाऊँ छोड़ सब झमेले ,
फिर अगले पल ये ख्याल आता ,
कि लोग कहेंगे व्याभीचारी तत्व है |

अजीब सी कश्मकश है ,
चारों तरफ दर्द ही बस है ,
कोई समझता नहीं मुझे अब ,
यही उलझन जबरदस्त है ||



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