ऐसे नहीं देश गिरता है कोई
ऐसे नहीं देश गिरता है कोई
ऐसे नहीं देश गिरता है कोई,
दुश्मनों की चाल सदियों से
गहरा साजिश रचा रहता है ,
अंत करके इस देश में,
वो भी दिखाया जाता है
जब कहानी में बहुत कुछ,
और शेष बचा रहता है ,
आंकता है दुश्मन ,
युवा के मानसिक संतुलन को
फिर इस क़दर नक़ली ,
माहौल बनाया जाता है
नायक के किरदार में
खलनायक जब-तक दिखने ना लगे
तब तक कहानी को निचोड़
निचोड़ कर फिल्माया जाता है ।
फिर घुलने लगता है,
विष तुम्हारे विचारों में ,
और कपटता का तुम्हें,
लत लगाया जाता है,
लगता हैं मस्तिष्क में द्वेष ,
घूमने देश के प्रति,
इस तरह इस *भारत* को ,
कमजोर बनाया जाता है।
--पंकज साहनी
