अधूरे गीत
अधूरे गीत
कुछ गीत जो पूरे हो गए थे
जाने क्यों अधूरे लगते हैं।
वो सपने जिनके लिए हम जीते थे
लगता था कि पूरे हो गए हैं।
जो कुछ करना चाहते थे
सब तो हासिल कर लिया ही था।
अब सपने पूरे करके जब
चैन की सांस लेनी चाही।
आंखें बंद करके बैठे पल भर को।
पाई हुई खुशियां जब गिननी चाही।
आंखे खोली तो देखा
वह तो थी एक मृग मरीचिका।
कहने को तो हासिल सब कुछ था।
लेकिन कुछ भी अपना कब था।
हाथ तो अब भी रीते ही रह गए,
जो चुक गया वह तो जीवन ही था।
सब कुछ पाकर भी कुछ पा ना सके।
अपनी ही कमाई को खा ना सके।
जीवन के इस छोर से और जो देखा,
अपना कोई भी पा न सके।
सपने हुए पूरे लेकिन जीवन बीत गया
संजोया हुआ सामान सब और फैल गया
अंधेरी रात में अब अंधकार भी घना था।
फिर कभी तो शायद उजाला भी होगा
इसी इंतजार में मैं मुस्कुरा कर अंधेरे में भी बैठ गया।
