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Sheetal Jain

Abstract

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Sheetal Jain

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अभिमान

अभिमान

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एक दिन आकाश गंगा में

संगोष्ठी हुईरात और दिन की

आपस में तकरार हुई 

दिन को था अभिमान 


मेरे बिना नहीं चलेगा किसी का काम 

रात भी मुखरित थी

बोली मेरे बिना 

कैसे मिलेगा सबको अभिराम 


तारीफ़ में दोनों की

खूब कशीदे पढ़े गए

महत्ता किसकी कम या ज़्यादा 

झगड़े शुरू हो गए 


इन्द्र ने नारद को बुलाया 

कुछ तो हल निकालो भाई

नारद बोले 

तुम लोगों को इतनी सी बात

समझ नहीं आई


दोनों प्रहर बराबर रख 

संतुलन की रेखा है बनाई

बड़े या छोटे की बात 

कहाँ से आई 


स्व विवेक से काम न लेकर

अभिमान से दोस्ती क्यों बढ़ाई॥


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