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Dr Baman Chandra Dixit

Abstract

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Dr Baman Chandra Dixit

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अब तो बस कीजे

अब तो बस कीजे

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बहुत हो चुका सितम अब तो बस कीजे

बरदास्त के बावत एक सीमा तय कीजे।


धीमी हो चली सफ़र और रुकावटें हज़ार

मुमकिन के लिये एक गुंजाइस तय कीजे।


थके कदमों को आराम न दे सके सही

मुश्किल राहों में कांटे बिछाया न कीजे।


खामोश हो चुके हैं खूब रिशाव के बाद 

जख्मी जवाबों से तीखे सवाल न कीजे।


जान होती कहाँ अख्तियार में लाशों की

अब तो राख करने से बाज आया कीजे।


करना तो बस एक करम कीजे जनाव

जी सकूँ खुद की तरह इतनी रहम कीजे। 


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