आस्थाओं के अवसान
आस्थाओं के अवसान
भाव से भावेश का
आस से आकाश का
तंत्र से तन्मेष का
नाता बहुत पुराना
बस इतनी से बात का
एहसास ही मुझे
आप सब विद्वानों को
सादगी से था कराना।।
झूझते तो सभी हैं
जिंदगी की जंग से
अपनी अपनी कोशिश
कोई कोई विरला
टूट जाता है बीच
मझधार में यही तो
है आज के परिपेक्ष्य का
विषय था समझाना।।
कोई नदिया कोई सागर
कोई बादल कोई बदरी
कोई नरम नरम गुदगुदा
काव्यात्मक छंद होता है
कोई लिख कर मुस्कुरा दे तो
कोई कोई अश्रुधार देकर
भावनाओं का विद्रूप होता है
मुझे इतना ही आता है
बस इतना ही है अफसाना
आज मौका मिला तो कह दिया
वरन को सुनता है दीवाना।।
