आशा
आशा
ठिठुरती सर्दी
नंगे पाँव
देश का भावी भविष्य
दो नन्ही-नन्ही जान
ढूँढता छाँव।
काँधे पे झूलता
लम्बा सा डण्डा
बाँधे गुब्बारें।
दो रूपये-दो रूपये
बड़ा पाँच रुपये का
की जोर-जोर से लगाते गुहार।
आँखों में उम्मीद और आस
मन में पक्का विश्वास
जहाँ देखते छोटे-छोटे बच्चें
न जाने कितनी बार करते मनुहार।
देख गुब्बारें बच्चें उछलते
लेने के लिए बार-बार मचलते
बच्चों की खुशी की खातिर
माँ-बाप की जेब से पैसे छलकते।
बच्चें खुशी में झूमते
गुब्बारें को हवा में लहराते
जमीन पर उछालते
खुशी का करते इजहार।
मुस्कराते वो अधनंगे बच्चें
अगले ग्राहक से गुब्बारा
खरीदने की लगाते मनुहार।
जी, गुब्बारे को मेहनत से फुलाया हैं
खुशी से इसे किसी ने
आसमाँ में लहराया हैं।
हम करने लगे बात
अरे स्कूल नहीं जाते आप
इतनी सर्दी की ठिठुरन भरी रात
न मौजें, न जूते और न कोई ताप
क्यों बेच रहे हैं गुब्बारें आप--?
माँ गुब्बारें फुलाती है
बाप गुब्बारें बेचता है
पार्क, चौराहों पर आवाजें लगाता है
सिर्फ चंद पैसे ही कमाता है।
माँ कहती है
इतने में नहीं होता गुजारा
अब तुम बड़े हो गए हो
बनो हमारा सहारा।
सभी मिल कर इतना कमा लेते हैं
पेट भर रोटी खा लेते हैं।
स्कूल जाना और
तन ढकना जरूरी है
अब क्या करें मजबूरी हैं।
डिजिटल इंडिया हो गया
इस विकास के युग में
इन मासूमों का बचपन
न जाने कहाँ खो गया।
ये इस देश के भावी निर्माता
बस मामूली सी लगा रहे हैं
आस और आशा
अब और न दो कोई भी निराशा
सिर्फ मूलभूत जरूरतों को पूरा करो
मेरे विधाता-मेरे विधाता।
