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Shailaja Bhattad

Abstract

5.0  

Shailaja Bhattad

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आरजू

आरजू

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है आरजू नदी की तरह बहती रहूँ ।

मुस्कुराकर मंजिल की ओर बढ़ती रहूँ ।

हर आते रोड़े से अलविदा लेती रहूँ ।

किसी से न गिला न किसी से शिकवा रखूँ।

किसी को न कभी आहत करूं।।


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