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Vaidehi Singh

Inspirational

4  

Vaidehi Singh

Inspirational

आओ संजोएँ

आओ संजोएँ

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सुहागन सी धरती के आभूषण छिन गए हैं, 

वीराने में बदलते धरती के सौंदर्य पर हम गौर किए बिन गए हैं। 

सीने में अनगिनत दर्द छिपाए, हमसे स्नेह करे धरती, 

पर हमारे कृत्यों से, हर बार धरा माँ की ममता मरती। 

धरती का सौंदर्य इतिहास के पन्नों में ना खोए, 

आओ उनके रूप को संजोएँ। 


ये कैसा खिलवाड़ इंसान कर रहा है, 

आज शायद हर एक जीव "इन्सानियत" से डर रहा है। 

वायु की सरगम पर झूमते पेड़ों को काटते हैं, 

और प्रदूषण में साँस की हवा छाँटते हैं। 

आओ, हम सब मिलकर पेड़ों के बीज बोएँ, 

आओ, उनके रूप को संजोएँ।


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