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Surendra kumar singh

Romance


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Surendra kumar singh

Romance


आज यूँ ही

आज यूँ ही

1 min 12 1 min 12


आज यूँ ही

आजादी के ख़याल में

डूबने लगा,

तुम्हारे साथ

डूबता गया डूबता गया

और जब ठहराव आया तो

वहाँ बस प्रेम था

तुम्हारा

इंसानियत थी तुम्हारी

और गुलामी की महत्वाकांक्षाओं के

बुलबुले थे।

तो यूँ ही आता रहे आजादी का खयाल

बना रहे उसमे डूबने का मन

कितना बोझ है

एक आजादी के

खयाल भर न होने से।


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