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Shakti Kumar

Tragedy


5.0  

Shakti Kumar

Tragedy


आज का पुरुषार्थ

आज का पुरुषार्थ

1 min 480 1 min 480

पल्लू क्या खिसका

उसके आँचल से

साहब की नियत ही 

खिसक गयी


देखकर उस अबला के 

वक्षस्थल को

बहने लगी अरमानो की नदियाँ

बचपन में जिस वक्ष ने 

किया तुझे तृप्त


अब उसी की चाह में

हवस की राह में

चल पडा है 

जिस्म की भूख में

इज्जत की लूट में

चल पडा है


चुंबन की तृष्णा में

दरिंदगी की वृष्णा में

चल पडा है

जिस योनि से निकल देखा 

ये जग सारा

आज उसी की चेष्टा में 

फिर रहा है मारा मारा

प्यास से मर रहा है


तत्पर है करने को

अवैध यौन क्रिया

इंसानियत को शर्मसार करने

कि है यह प्रक्रिया

वाह रे भाई 


हैरत में है वो खुद रचनाकार

पछताता होगा वो भी 

बनाकर लिंग जैसा अंग


बेहतर होता गर बनाता 

प्रजनन का कोई और साधन

तेरी यह दरिंदगी ना देखता

इंसानियत को लज्जित होते ना देखता

और सबसे बड़ी बात 

इक और आसिफा को मरते ना देखता।


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