आगाज़
आगाज़
रोंक सके तो रोक ले तू मेरी फितरत को,
आगाज़ बन चुकी हैं दम मेरी उल्फत को।
चंद लाईनें क्या लिखता हूं जनाब,
विरोधी समझ लेते हैं मेरा जबाब॥
ओये ओये इतना झूंठ मत बोल फ्री में,
किसी की जान जा सकती है हंसी में।
यार यह तेरी कौन सी गली का चौराहा है,
पहले तो कहा था गली में तेरा चौबारा है।
उजड़ जैइयै जब चमन तुम्हारो,
तबहिं याद अईयै दामन हमारो।
कहां लै चलैगो तू कश्ती हमारी,
आगाज़ है अबतौ हस्ती हमारी।
कुछ देर बैठ गया मुंडेर तेरी,
समझ गया क्या चाल तेरी।
अब और न कर तू लतीफी,
बदल गया जिया शाख तेरी।
भाव बिकता भाव में,
आदमी रुकता है छांव में।
