Unlock solutions to your love life challenges, from choosing the right partner to navigating deception and loneliness, with the book "Lust Love & Liberation ". Click here to get your copy!
Unlock solutions to your love life challenges, from choosing the right partner to navigating deception and loneliness, with the book "Lust Love & Liberation ". Click here to get your copy!

Shree Prakash Yadav

Tragedy

5.0  

Shree Prakash Yadav

Tragedy

आदमी

आदमी

1 min
242


जिस्म पे ओढ़कर सभ्यता का लिबास,

विचारों से नंगा हो रहा है आदमी।


थे रोपने जहाँ हमदर्दगी के फूल,

बीज नफरतों के बो रहा है आदमी।


मंदिरों में पूजा और मस्जिदों में नमाज,

इन्हीं व्यर्थ चक्करों में खो रहा है आदमी।


टूट गए दिल हो जैसे काँच की तस्वीर,

बोझ एकता के मगर ढो रहा है आदमी।


खुद के लहू से सींचे थे जिस रंगे चमन को,

देखकर उजड़ा हुआ अब रो रहा है आदमी।


निहित स्वार्थ में तोड़ रहा है आदमी

हर जख्म को सीने से लगाया हमने,

फिर भी अलमस्त कर रहा है आदमी।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy