अनैतिक प्रेम?????
अनैतिक प्रेम?????
मेरठ के इस स्कूल में आते ही सीमा अपनी 30 साल पुरानी जिंदगी को जीने लगती है जिसको कि जाने उसने अपने मन के किस कोने में छिपा रखा था इसका जिक्र वह खुद से भी नहीं करना चाहती थी। डायरेक्टरेट ऑफ एजुकेशन की ऑडिट ऑफीसर होने के कारण उसे मेरठ के राजकीय स्कूल का सरप्राइस ऑडिट करना था। उसकी टीम ने लगभग सारा काम कर लिया था और आज फाइनल साइन करने के लिए उसे स्कूल में आना था। उत्तर प्रदेश के ऑडिट विभाग में होने के कारण उसे जगह-जगह पर ऑडिट करने के लिए जाना पड़ता था। सुबह से शाम होने को थी और मेरठ से गाजियाबाद अपने घर पहुंचने में समय भी लगना था। प्रिंसिपल थोड़ी देर पहले तक तो उनके साथ ही बैठी थी अभी आई कहकर वह बाहर की ओर निकल गई थी। क्योंकि स्कूल 1:00 बजे तक बंद हो जाता था तो आज किसी सम्मानित परिवार ने उस स्कूल के प्रांगण में मृत्योपरांत किसी की क्रिया का प्रोग्राम रखा था। प्रिंसिपल भी नीता को अभी आई कहकर 4:00 बजे उस क्रिया में ही सम्मिलित होने के लिए चली गई थी। प्रांगण में बने हुए स्टेज से भजनों की आवाज लाउडस्पीकर से आ रही थी। नीता भी यूं ही अपने ख्यालों में खोई हुई विद्यालय के प्रांगण तक ही आ गई थी। उसकी टीम में मनु मैडम को भी उसने पहले ही घर जाने की इजाजत दे दी थी क्योंकि मनु मैडम का घर बहुत दूर था और काम सारा खत्म हो गया था बस नीता के देखने के बाद केवल प्रिंसिपल मैडम के साइन की ही दरकार थी। अकेली बैठी नीता जब क्रिया वाली जगह पर पहुंची तो यूं ही उत्सुकता वश उसने वहां बाहर नीचे गिरा हुआ एक कार्ड देखा जिसमें लिखा था उठाला, अमन कुमार सचदेवा। नीता के पैरों तले जमीन निकल गई। बहुत से विचार और ख्याल उसके मन में कौंधे और वह घबराकर अंदर उस स्थल पर ही चली गई। सामने अमन की हार लगाई फोटो के सामने लोग पुष्पांजलि अर्पण कर रहे थे। बस उसने भी कुछ पुष्प उठाए और अमन की फोटो के सामने रख दिए। नीता को पता भी नहीं चला कब उसकी आंखों से अविरल असुरों की धारा बहने लगी। तभी प्रिंसिपल मीरा पांडे की जब नजर नीता पर पड़ी तो उन्होंने कहा ,बस चलो रूम में चलते हैं। वह दोनों निकलने को ही थे कि अमन के बेटे और रिश्तेदार उन्हें चाय प्रसाद लेकर जाने का आग्रह करने लगे। प्रिंसिपल मीरा पांडे ने उन्हें कहा कि मैं चाय प्रसाद लेने को अभी आ जाऊंगी बस थोड़ा सा रूम में काम करके आती हूं।
नीता को देखकर प्रिंसिपल पांडे ने कहा कि यह अमन सर मेरठ के बहुत अच्छे और प्रसिद्ध व्यवसायी थे। हार्ट अटैक होने के कारण उनकी मृत्यु हो गई थी। अब क्योंकि प्रोग्राम स्कूल में ही होना था और हम लोगों के उनसे संबंध भी अच्छे हैं तो बस थोड़ी देर तो जाना बनता ही था ना। उन्होंने नीता से क्षमा मांगते हुए कहा बोलो मैडम कहां साइन करने हैं। कमरे में आने के बाद चपरासी को चाय लाने का आदेश देते हुए उन्होंने साइन करने के लिए पेपर मांगे। नीता ने उखड़े मन से अपने पेपर्स पर साइन करवाए और औपचारिकता वश जहां जहां भी प्रिंसिपल मीरा पांडे ने कहा, नीता ने वहां भी साइन कर लिए। चाय आने पर नीता ने चाय पीने से बिल्कुल मना कर दिया और अपने आपको संयत करते हुए वह अपना पर्स उठाकर अपनी गाड़ी तक चली। विद्यालय के प्रांगण से निकलते हुए अमन की पत्नी और बच्चों को बाहर से ही देखा।
बाहर उनका ड्राइवर गाड़ी लिए खड़ा था बिना कोई निर्देश दिए नीता अपनी गाड़ी में पीछे बैठ गई और बहुत पुरानी यादों में खो गई। उसका अपना घर तो गाजियाबाद में था। गाजियाबाद के कॉलेज में ही मेरठ में रहने वाला अमन उसका सहपाठी था।
अमन और वह दोनों एक ही कॉलेज से बीकॉम कर रहे थे। दोनों की यूं ही कैंटीन में हुई मुलाकातें धीरे-धीरे प्यार में बदलने लगी थी। अमन की बड़ी बहन की शादी में वह अपने कॉलेज के पूरे ग्रुप के साथ अमन के घर भी गई थी। कॉलेज से दोनों ही जब तब यूं ही निकल कर कहीं-कहीं घूमा करते थे। अमन जब कभी कहीं बाहर भी जाता तो नीता के लिए वहां से कुछ ना कुछ उपहार जरूर लाया करता था। शायद इसे ही प्यार कहते होंगे कि घर आते ही कॉलेज की पढ़ाई या कि उसके होमवर्क की जगह यह ख्याल आता था कि कल कॉलेज में क्या पहन करके जाएं। अमन को क्या पसंद है और क्या नहीं, मन इसी विषय में ही ज्यादा रिसर्च करता था।
अमन के पिता का भी काफी अच्छा व्यवसाय था। सुनने में आया था कि मेरठ के पॉश इलाके में उसके पिता की बहुत सी दुकानें हैं। उस समय जबकि डिपार्टमेंटल स्टोर का चलन भी नहीं था तब उसके पिता ने बहुत बड़ी जगह में अपना एक डेली नीड स्टोर बनाया हुआ था। अमन के लिए पढ़ना कोई बहुत जरूरी तो नहीं था इसलिए उसे कई बार पापा की दुकानों के काम के सिलसिले में ही शहर से बाहर जाना होता था। जब भी वह कॉलेज नहीं आता था तो नीता को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था।
एक दिन अमन ने जब नीता से कहा कि वह उससे विवाह करना चाहता है क्योंकि अमन की बहन की शादी के बाद मां अपने आप को बहुत अकेला महसूस करती हैं और वह चाहती है कि जल्दी ही घर में एक बहू भी आ जाए। अमन ने नीता से कहा कि मम्मी की बहू के रूप में तुम्हारे सिवा तो मैं किसी और को सोच भी नहीं सकता। यह सुनकर नीता को अच्छा तो बहुत लगा मानो उसके सारे सपने सच हो गए हो लेकिन घर में उस से छोटी तीन बहने और दो भाई। नीता की मम्मी तो हमेशा घर के काम में ही व्यस्त रहती थी। संस्कारों और भाई बहनों से भरे हुए परिवार में बनिया फैमिली की नीता भला खुली विचारधारा वाले पंजाबी परिवार के अनुरूप खुद को कैसे ढाल पाएगी? खैर अगर यह सब बातें मान भी ली जाए कि अमन का साथ जीवन में हो तो सब कुछ अपने आप ही सही हो जाएगा तो भी वह अपने दादी दादा को कैसे मनाए कि वह प्रेम विवाह करना चाहती है। उनके उस रूढ़ीवादी परिवार में जिसमें कि उसको कॉलेज में पढ़ने की अनुमति ही बड़ी मुश्किल से मिली हो तो प्रेम विवाह के लिए सब को मनाना मुश्किल नहीं होगा क्या? दूसरे दिन फिर अमन के वही सवाल करने पर उसने अमन को अपने परिवार के संस्कारों का हवाला देते हुए कहा कि हमारा प्यार शायद इससे आगे नहीं बढ़ सकता यह संभव ही नहीं है कि इस विवाह के लिए हमारा परिवार राजी होगा। अमन ने मुस्कुराते हुए एक ही बात कहा था कि मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता और तुम्हारे परिवार को मनाना भी मेरी ही जिम्मेदारी है मुझे सिर्फ और सिर्फ तुमसे मतलब है अगर तुम हां कहती हो तो आगे का सारा काम मैं खुद कर लूंगा।
उस रात भी नीता सो नहीं पाई। मन में सैकड़ों विचार आ जा रहे थे। उहापोह में ही समय कट रहा था यदि उसके माता-पिता मान भी जाएं तो जैसा कि दादी कहती है कि जैसा घर का बड़ा बच्चा करता है वैसा ही सारे और करेंगे तो मैं ही अगर प्रेम विवाह कर लेती हूं तो मेरी छोटी बहन ने भी----- और मेरे माता पिता तो शर्म के मारे कहीं अपने गांव में किसी को मूंह भी दिखाने के लायक ना रहे तो। ऐसे विचार नीता को बचपन से घुट्टी के जैसे पिलाए गए थे।
अगले दिन अमन के फिर से पूछने पर उसने स्वयं ही उससे विवाह के लिए इनकार कर दिया। अपने मन को वह यूं ही समझाती रही कि उसका और अमन का विवाह बेमेल ही होगा। कहां अमन एकदम मॉडर्न और मस्त लड़का जो कि कभी-कभी सिगरेट और शराब भी पी लेता है, उनके घर में ऐसा लड़का कहां जगह पा सकता है वगैरह वगैरह। उसके बाद काफी दिन वह कॉलेज भी नहीं गई।
बहुत दिन बाद जब वह कॉलेज गई तो अपनी सहेलियों से ही उसे पता चला कि अमन की सगाई हो चुकी है और अमन ने सबको पार्टी भी दी है। वह अपने अंतर्मन में बहुत दुखी हुई और अमन से मिलने पर उसकी अश्रु धारा भी बह उठी। अमन और वह उस दिन भी कॉलेज से बाहर अपने फेवरेट होटल में जब जाकर बैठे तो नीता की आंखों में आंसू देख कर अमन ने नीता से कहा कि मेरा प्रपोजल आज भी मेरे प्यार के जैसे जिंदा है। तुम अगर अब भी हां कहती हो तो मैं शादी तुमसे ही करूंगा। मेरे मम्मी पापा मेरे किसी भी कहने को टालते नहीं है। नहीं अमन, नीता ने कहा यह संभव ही नहीं है और उसके बाद नीता फिर अपने घर चली गई। दादी दादा और मां की नजरों से नीता की उदासी छिपी ना रही।
कुछ समय बाद नीता अपनी बुआ के घर जो कि गाजियाबाद में ही रहती थी गई तो यह उसे बाद में ही पता चला कि वहां पर उसकी बुआ ने सबको इसलिए बुला रखा है क्योंकि नीता को एक लड़के ने देखने को आना था। मनोज की माता को तो नीता पहली नजर में ही भा गई और सब ने अपनी हामी भर दी तो दादी के कहने पर उसी दिन ही उसकी होने वाली सासू मां ने उसे गले में सोने की चेन भी पहना दी थी।
कॉलेज का फाइनल ईयर चल रहा था। उसकी शादी की डेट भी 2 महीने बाद कॉलेज के इम्तिहान खत्म होते ही निकाली गई। अब जब नीता कॉलेज गई और अमन से मिली तो अमन ने अभी चिर परिचित मुस्कान बिखेरते हुए कहा चलो अच्छा है अब तुम्हारी भी शादी हो जाएगी। कम से कम अब मुझे कोई ग्लानि तो ना होगी। मेरी मम्मी को तो अपनी बहू बहुत पसंद है और मैंने भी अपनी मम्मी को मना लिया है कि आने के बाद उसका नाम नीतू ही रखेंगे। उसके बाद नीता पेपरों में और फिर अपनी शादी की खरीदारी में ही व्यस्त हो गई थी।
यह एक संयोग ही था कि दोनों की शादी की तारीख भी उसी महीने में पहले नीता की और 2 दिन बाद अमन की निकली थी। कॉलेज के और दोस्तों के जैसे नीता की शादी का कार्ड भी अमन को दिया गया था, अमन नीता को तो नहीं मिला था लेकिन उसके द्वारा भिजवाई गई पायल नीता को जरूर मिल गई थी। क्योंकि 2 दिन बाद नीता भी अमन की शादी में नहीं जा सकती थी इसलिए उसने भी एक सुंदर सा ब्रेसलेट अपनी कॉलेज की सहेली और दोस्तों के हाथ उसकी पत्नी के लिए भिजवा दिया था।
विवाह के उपरांत भी नीता ने कभी उस पायल को ना तो पहना और ना ही किसी और को दिया। अमन के प्यार के जैसे ही वह पायल भी घर के लॉकर के किसी कोने में छिप कर रह गई थी। विवाह के बाद भी नीता ने और पढ़ाई करी और अकाउंट्स का पेपर देने के बाद वह उत्तर प्रदेश के सरकारी विभाग में अकाउंट्स ऑफीसर नियुक्त हो गई थी।
समय बीत रहा था, अमन और वह कभी नहीं मिले। कुछ समय तक तो कॉमन दोस्तों से नीता को अमन की गृहस्थी के बारे में पता चलता रहता था। नीता भी अपनी गृहस्थी में ही व्यस्त हो गई थी। अपने पुत्र का नाम उसने भी मनन ही रख लिया था । धीरे-धीरे जैसे-जैसे वह अपनी जिम्मेदारी में व्यस्त होती रही उसे अमन की कोई जानकारी नहीं रही। हालांकि मन के किसी कोने में पढ़े हुए कोई भी ख्याल अगर बाहर निकल कर आने को भी होते थे तो वह जबरन मन के उसी कोने में ठूंस दिए जाते थे।
नीता के बेटी और बेटे दोनों का विवाह हो चुका था और दोनों बच्चे भी अपने गृहस्थी में सुखी थे। कई बार पुराने समय में गोते लगाते हुए नीता को ख्याल आता था कि शायद अमन के भी बच्चों का विवाह हो चुका होगा या, हालांकि हर उस ख्याल के बाद में है ग्लानि से भर जाती थी कि कहीं ऐसा ख्याल करना अनैतिक तो नहीं।
आज जीवन के इस मोड़ पर वह खुद अमन की मृत्यु पर पुष्प अर्पित करके आई है, कहीं अमन की बहन ने नीता को पहचान तो नहीं लिया होगा या ----नहीं नहीं अब वह पहले से कितनी बदल गई है। उसके सफेद बाल और नहीं शायद नहीं पर-------।
मैडम घर आ गया। अचानक से नीता की तंद्रा टूटी और वह अपने घर के अंदर घुसी। बहु रानी पहले ही अपने स्कूल से घर आ चुकी थी।पोता बंटी भी नीता को देखकर बहुत सी बातें करने को सामने खड़ा हुआ। बहुरानी ने सूचना दी कि पापा कह रहे थे आज वह जल्दी आएंगे और आप दोनों को आज अग्रवाल जी की बेटी की इंगेजमेंट पार्टी में जाना है। पापा कह रहे थे कि मम्मी को बोल देना दफ्तर से आते आते हुए फूलों का गुलदस्ता लेते हुए आए। मैं आपको कितने फोन मिला रही थी लेकिन आपने सुने ही नहीं मम्मी! नीता अभी भी चुप थी लेकिन भीतर ही भीतर ही भीतर मानो एक बहुत बड़ा ज्वालामुखी फूट रहा हो।
मैं बहुत थक रही हूं , अभी थोड़ी देर में बात करती हूं कहकर नीता ने अपने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया। अपने बेड पर बैठकर वह सिर्फ अपने लगातार बहते हुए आंसुओं पर काबू करने की कोशिश कर रही थी। यह आंसू भी कहीं अनैतिक तो नहीं है, कोई देख ले तो उसे क्या समझाएगी? आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

