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रिश्तों की कीमत

रिश्तों की कीमत

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"बेटा तबीयत खराब है मेरी, तुम्हें देखने को जी चाह रहा है,बच्चों को लेकर आ जाते तो...।"

"क्या पापा आप भी बच्चों सी बात करते हैं। मैं कोई डाक्टर हूँ....। पैसे भेज दूँगा, किसी डाक्टर को दिखा लेना " कह कर फोन रख दिया विश्वास ने।

अश्रुधारा बह चली रामसरन की आँखों से....साथ में खुद से थोड़ी ग्लानि भी और शिकायत भी थी अपनी तालीम पर।याद आ रहा था ...। विश्वास कितनी ज़िद करता था गाँव में अपने दादाजी से मिलने की....,अपनी बुआ के बीमार होने पर कितना तड़पा था उनसे मिलने को....पर राम सरन ने पैसे, स्टेटस और कैरियर को हमेशा रिशतों से ऊपर रखा.....और यही तालीम बेटे को दी। और विश्वास आज भी पिता की दी हुई सीख को मन से निभा रहा था।


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