चंपा

चंपा

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चंपा यह शब्द सुनते ही मेरे जेहन में उस शख्स का अक्स उभर जाता है जिसके साथ मैंने अपने बचपन का बहुत बड़ा हिस्सा गुजारा था।

मेरे पिताजी गांव के जमींदार थे। उनका गांव में बहुत ही बड़ा नाम था। गांव के सब लोग उनकी बात मानते थे। हमारी बहुत बड़ी हवेली थी। उसमें बहुत सारे कमरे थे बहुत बड़ा दालान था। यहाँ में अपनी सखियों के साथ खेला करती थी। एक बहुत बड़ी बैठक थी। उसमें पिताजी गांव के लोगों के साथ मिलकर बैठकें करा करते थे। हमेशा उस जगह कोई ना कोई रहता ही था। कभी बैठक खाली नहीं रहती थी, हम लोग चार भाई-बहन थे। मेरे तीन भाई और मैं इकलौती बहन थी। मैं सबसे छोटी थी इसलिये सब लोगों की बहुत लाडली थी। मुझे सब बहुत प्यार करते थे खासकर पिताजी बहुत प्यार करते थे।

हमारे घर में बहुत सारे नौकर-चाकर थे। उसमें से गीता काकी एक थी जब से होश संभाला उन्हें अपने घर में ही देखा था। एक बार मैंने देखा कि गीता काकी 2 दिन तक काम पर नहीं आई और जब आई हो तो अपने साथ एक लड़की को लेकर आई। वह लड़की लगभग मेरी ही उम्र की होगी, काला रंग, पीले दांत, घोंसले जैसे बाल, फटे हुए कपड़े मगर इन सब में भी उसकी बड़ी-बड़ी आंखें थी जो बहुत कुछ कह रही थी। गीता काकी ने बताया कि यह मेरी बहन की लड़की। बहन और जीजा की हैजे से मौत हो गई है और इसे रखने वाला कोई नहीं हैं, इसलिए मैं इस करमजली को को अपने साथ ले आई, अपने मां-बाप को तो खा गई है अब इसे कोई रखने को तैयार नहीं हो रहा है तो मैं ही अपने साथ ले आई हूं। मैंने देखा कि गीता काकी की बातों का उस लड़की पर कोई असर नहीं हो रहा था और शून्य में ताक रही थी। बस और अपने ही अपने में ही मस्त थी। काकी ने बताया कि उसका नाम चंपाकली है।

चंपाकली को मेरे काम के लिए रख लिया गया। मेरे सारे काम वही करती थी। मैंने देखा की वह सारे काम तो करती है मगर बातें कुछ नहीं करती है, हमेशा चुपचाप रहती है। मुझे यह अच्छा नहीं लगता था कि वह कुछ बोलती क्यों नहीं। उसका नहीं बोलना मुझे खलता था। मैं उसे बहुत परेशान करने लगी कि शायद ये कुछ बोलेगी, मेरी शिकायत करेगी मगर वह कुछ नहीं कहती थी। मैं उससे बहुत सारे काम करवाती मगर कुछ नहीं कहती थी। एक दिन मैंने देखा कि वह एक कोने में छिपकर रो रही है। यह पहली प्रतिक्रिया थी जो मैंने देखी थी।

मैं उसके सामने जाकर खड़ी हो गयी, वह मुझे देखकर भाग गई। उसके बाद से मैं उसके साथ नरम व्यवहार करने लगी, मैंने देखा की वो भी थोड़ा बदल रही है।

मेरा थोड़े से सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार ने उसके चेहरे पर हँसी ला दी थी। मैं उसे चंपा कहा करती थी। मैंने उसे अपने पुराने कपड़े दे दिए थे और हमारे घर में रहकर उसकी रंगत भी निखर गयी थी। थोड़ी सही भी लगने लगी थी, चंपा और मैं घंटो बातें करते थे, वह मुझे अपने घर की बातें बताया करती थी, गांव की बातें बताया करती थी, अपने मां बाप के बारे में बातें करती थी, मैं भी उसे अपने स्कूल के बारे में बताया करती थी। हम लोग अब बहुत अच्छी सखियाँ बन गई थी। हम लोग अधिकतर समय साथ ही गुजारते थे।

हमारे गांव मे अमराई थी जहां मुझे जाना बहुत पसंद था। हम दोनों साथ में जाते वह पेड़ पर चढ़ जाती थी और मेरे लिए बहुत सारे आम तोड़ती थी और मैं उन्हें समेट कर इकट्ठा करती थी। तब वापस आ जाते थे। इसी तरह हमारा समय निकलता है, इस तरह हम 15 साल के हो गए थे। मैंने देखा इधर घर में बातें हो रही थी। गीता काकी चंपा की शादी की बात कर रही थी। मां ने मुझ इन सब के बीच बोलने का मना कर दिया था। काकी ने कहा कि पहले इसके चाचा इसको रखने का मना कर गया था मगर अब कहता है कि "यह मेरे भाई की लड़की है इसलिए मैं इसको ले जाऊंगा, इसकी शादी करूंगा, मैंने इसके लिए एक अच्छा लड़का देखा है।"

अब ये उनके खानदान की लड़की है मैं मना भी नहीं कर सकती, मुझे इसे भेजना ही पड़ेगा।

मैंने यह बात सुनी तो मुझे बहुत ही बुरा लगा। मैं अब चंपा के बिना रह नहीं सकती मगर कर क्या सकते थे। मुझे छोड़कर चंपा को जाना ही पड़ा। चंपा भी नहीं जाना चाहती थी क्योंकि उसने मुझे बताया था कि उसके मां-बाप के जाने के बाद उसके चाचा-चाची उसके साथ बहुत ही खराब व्यवहार करते थे। बहुत सारा काम करवाते थे और उसको सही से खाने को भी नहीं देते थे और मारते भी बहुत थे मगर हम लोगों की बात किसी ने नहीं सुनी और चंपा को जाना ही पड़ा।

कुछ समय बाद खबर मिली कि चंपा के चाचा ने उसकी शादी एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति से कर दी है जिसके चंपा की उम्र से बड़े दो बच्चे थे। इसके एवज में उसके चाचा को बहुत बड़ी रकम मिली थी एक तरह से उन्होंने चंपा का सौदा कर दिया। यह सुनकर मुझे बहुत ही बुरा लगा था। बाद में मैं पढ़ने के लिए शहर में आ गई और मुझे चंपा के बारे में कोई भी जानकारी नहीं मिली। मैं अपनी पढ़ाई में, नई सहेलियों के रंग में रम गई थी। चंपा की यादें अब धुंधली हो रही थी मगर जब मैं छुट्टियोंं में गांव जाती तो चंपा के बारे में जरूर पूछती मगर मुझे सही से कुछ भी पता नहीं चल पाता था। अब मेरे कॉलेज के एग्जाम खत्म हुए और मैं गांव गई तो मैंने सुना कि चंपा ने अपने पति का खून कर दिया है और वह जेल में है।

मुझे यह सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ कि हमारी भोली-भाली चंपा ऐसा कैसे कर सकती है। मैं किसी भी तरह से चंपा से मिलना चाहती थी मगर मैं जिस परिवार से थी उस समय वहां जेल जाना नामुमकिन था। मैंने किसी भी तरह मेरे भाई बड़े भैया को मनाया कि मुझे चंपा से मिलना है बातें करनी है तो वह पहले तो नहीं माने फिर किसी तरह वह तैयार हुए। फिर मैं चंपा से मिलने गई तब उसने जो बताया वह सुनकर तो मेरे पैरों तले जमीन ही निकल गई कि हमारी प्यारी चंपा ने कितना सहा है।

उसने बताया कि चाचा ने उसकी शादी उसके पापा के उम्र से भी बड़े व्यक्ति से कर दी थी जिसके 2 बच्चे थे और वह बच्चे चंपा की उम्र से भी बड़े थे। चंपा जब उसके घर गई उन लोगों ने उसे मां मानने से इनकार कर दिया और जो उसका पति था वह भी बहुत ही बेकार था। काम कुछ करता नहीं था उसे बस मुफ्त की नौकरानी चाहिए थी। उसे चंपा की देह से मतलब था। वह एक नंबर का शराबी था। घर में बिल्कुल पैसा नहीं देता था तो चंपा लोगों के घरों में बर्तन मांज कर घर का गुजारा करती थी। कुछ बोलती तो वह हमेशा चंपा को बहुत मारता था। चंपा कुछ बोलती तो कहता मैंने तुझे खरीदा है तू मेरी गुलाम, मैं तेरे साथ कुछ भी कर सकता हूँ। चंपा बच्ची तो थी कुछ बोल नहीं पाती थी। ये सब सहते -सहते 5 साल निकल गए चंपा के आपने बच्चे हुए नहीं। क्योंकि पहली बार गर्भ से हुई तो पति ने इतनी पिटाई करी की गर्भ का नाश हो गया उसके बाद कभी कुछ हुआ ही नहीं। पति के दोनों बच्चे तो उसे मां मानते ही नहीं थे इसलिए उसका साथ कभी दिया नहीं और एक दिन वह घर छोड़कर चले गए। उसके बाद तो उसके पति के जुल्म दिन पर दिन बढ़ते चले गए एक दिन तो हद ही हो गई, उसके पति को पैसे की जरूरत थी और उसने एक व्यक्ति के साथ चंपा का सौदा कर दिया। यह बात चंपा सहन नहीं कर पाई उसने पास रखा हँसिया उठा कर अपने पति को दे मारा। वह नशे में तो था, सहन नहीं कर पाया और वही ढेर हो गया। उसके बाद चम्पा खुद पुलिस के पास गई और सब बाते बात दी और तब से वो यहीं जेल में ही है।

मैंने यह सब बातें पिताजी को बताई। पहले तो उन्होंने बहुत डांटा और भाई को भी बहुत डांट पड़ी पर मेरी बात को समझ कर उन्होंने चंपा के लिए एक वकील से बात की तो वह चंपा का केस लड़ने की तैयार हो गया। चंपा का केस मजबूत था इसलिए वह जीत गई और चंपा जेल से छूटकर आ गई। वह हमारे घर आई। हमारे घर में सभी को उससे सहानुभूति थी इसलिये यहां से उसकी नई जिंदगी शुरु हुई। हमारे पिताजी ने उसकी थोड़ी शुरुआत की पढ़ाई करवाई जिससे उसने पढ़ना-लिखना सीख लिया। इसी बीच मेरी शादी हो गई। मेरे पति को जब मैंने चंपा के बारे में बताया तो उन्होंने कहा- हम चंपा को शहर में ले आएंगे यह उसके लिए अच्छा रहेगा। हमने शहर लाकर चंपा को समाज के लिए कार्य करने वाली संस्था का सदस्य बना दिया। चंपा उनके लिए कार्य करने लगी। वह संस्था अनाथ लड़कियों के लिए कार्य करती थी। अपनी मेहनत से काम करत-करते चम्पा उच्च पद पर पहुंच गई, वह अनाथ लड़कियों का बहुत ध्यान रखती थी। वह सोचती थी कि कोई भी लड़की चंपा की तरह दुःख न झेले जो उसके साथ हुआ वह किसी भी अनाथ लड़की के साथ ना हो।


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