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अगले जन्म मोहे बिटिया ही दीजो
अगले जन्म मोहे बिटिया ही दीजो
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© anju nigam

Drama Inspirational

5 Minutes   263    10


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"बिटिया तुम कार लायी हो क्या?"छः महीने से बिस्तर पकड़ चुके पापा की निरीह आँखो ने मुझे निहारा| पापा के मुँह से टुकड़ो में निकलते शब्दो को जोड़ यही मतलब निकला| मेरा सिर हाँ में हिला| पर उसके बाद का, उनका किया अगला प्रश्न मुझे अक्षरतः रट गया था| उनकी निरीह दृष्टि मुझे मुक कर देती|

भीतर से वे भी जानते थे कि मेरा जवाब क्या होगा| किसी के हाथो एक गिलास पानी माँग कर न पीने वाले पापा को बीमारी ने कितना बेबस,मजबूर कर दिया था| उनका ये हाल विभोर को भी द्रवित कर रहा था तभी उनकी दृष्टि में मेरी आँखो का दर्द मिल गया था|

"हो सके तो एक बार पापा को लखनऊ ले ही चले| आजकल तो ऐसी ऐम्बुलेंस भी आती हैं जो सारी मेडिकल सुविधाओं से लैस होती हैं| पापा को कोई परेशानी न होगी|" इनकी ऐसी उदार बातो पर भैया खीज उठे थे| थोड़ी देर बिना कोई जवाब दिये वहाँ खड़े रहे फिर हट गये| बाहर जा भैया ने मुझे आवाज दी," सुन बिन्नी,जरा इधर आ| शायद भैया अकेले में कुछ कहना चाह रहे हो और इनके सामने बोल न पा रहे हो|

"बिन्नी, हर बात पर सबको टाँग अड़ानी जरूरी हैं क्या? करो भी और सुनो भी|" भैया की आवाज में जमाने भर की कटुता भरी थी|

"पर.........." मैंने कुछ कहना चाहा तो भैया ने हाथ के इशारे से रोक दिया|

"तो अब घर के दामाद "सबमें" शामिल हो गये|"मुझे लगा आज अपने ही मायके से मेरी दूसरी विदाई हो गई, पहली से ज्यादा पीड़ादायक| माँ मेरी आँखो में घिर आये पानी को देख चुकी थी | ये भी| पर स्थिति नाजूक थी| माहौल की और मेरे मन की भी|

हाँ, भाभी की ओर से कोई प्रतिक्रिया न हुई| न अच्छी न बुरी| रोजमर्रा के काम की तरह वे हमारे चाय-नाश्ते का प्रबंध करती| दामाद आये हैं, तो उसी रोजमर्रा के खाने में कुछ अलग सा कर देने की कोशिश करती| मैं अक्सर उनकी जगह अपने को रख कर सोचती| और मन ये जरूर पढ़ता कि"घर का सिक्का तो खोटा" निकला पर उससे विलग हो भाभी जो कुछ भी कर रही हैं वो "बहुत" हैं|

भैया की उपेक्षा के बावजूद मैंने माँ को अलग ले जाकर कहा,"पापा की ये अदम्य इच्छा हम पूरी न कर पाये तो जीवन भर का मलाल रह जायेगा|"

माँ टुट गयी थी, पापा का जो लौह सरंक्षण उनके ऊपर बना रहा था,वो क्षीण हो चुका था|

असल में बात उससे भी आगे निकल चुकी थी|

" बिन्नी, इन्हें लखनऊ ले भी जाये तो रहेगे कहाँ?" माँ के शब्दो से बंधी बेबसी मैं संभाल नहीं पा रही थी|

"क्यों, अपने घर पर रहेगे| सामान बांंध कर ही तो आये हैं| एक बिस्तर खुलने मे कितना वक्त लगता हैं|" पापा को एक बार उनके घर ले जाने को मैं पूरी तरह तैयार हो चुकी थी|

" घर भी कहाँ रह गया हैं बिन्नी!! तेरे भाई ने फुफाजी से सौदा तय कर दिया हैं घर का |"माँ ने धीरे से इस गहरी बात का खुलासा किया|

मेरे मन की सीवन पूरी तरह उखड़ गयी थी| मन को किसी भी खुंटे से बांध रखना कठिन हो रहा था| सदमा गहरा था| पता नहीं माँ इस सब से अकेले कैसे जुझी होगी?

"ऐसे कैसे?" उस समय यही दो शब्द मेरे मुँह से निकले|

"लखनऊ से यहाँ आते समय ही तेरे भैया ने ये कह कर कि "जरूरी कागजात कहाँ अपने पास संभाल पाओगी", मकान के कागजात अपने पास रख लिए थे| वसीयत में तो तेरे पापा ने तीन भाग किये थे| पर हफ्ते भर पहले तेरे भाई ने मुझसे n.o.c करवा अपने आप ही सारा सौदा कर लिया|" माँ अपराधिनी सी नीचे मुँह किये खड़ी थी|

"तुने n.o.c में साइन क्यों किये?" मुझे माँ के ऊपर क्षोभ हो आया|

"पापा की हालत देख रही हैं| उस दिन अड़ ही गया कि साइन नहीं होगे तो अपने आप इलाज करवा लेना| फिर मैं किसी तरह का सहारा न दूँगा| बता मैं क्या करती? पापा को लेकर लखनऊ में अकेले भी तो संभल नहीं पा रहा था|" माँ की बातो में एक कड़वी सच्चाई थी| जिसे मैं नकार नहीं सकती थी|

"क्या मैं जीवन भर पापा-माँ को अपने पास रख सकती थी? पापा की तकलीफ देख आज विभोर का नर्म रवैया कल कठोरता में नहीं बदलेगा, इसकी मैं क्या गांरटी ले सकती थी?"

कमरे से पापा के कराहने की आवाज सुनते हमारे कदम उस ओर उठ गये| उनके मुँह से निकले अस्फुट जो निकला, उसे हम शब्दो में नहीं बांध पाये,पर उनकी आँखो से गिरी दो बूँदो ने हमारे दिलो को थाम लिया|

उस रात पापा बेहद बैचेन रहे| जब अपनो के खुन सफेद हो जाये तो दिल सौ-सौ खुन के आँसू रोता हैं|

रात मैंने और माँ ने खुब बैचेनियाँ पाली| पापा का शरीर बीमारी और बेबसी से थका था,तभी वे सो रहे थे| सुबह जब हमारी आँख खुली तो भाभी को कमरे में खड़ा पाया| यूँ भाभी पापा का लिहाज कर कभी कमरे में नहीं आती थी| हमारा शंकित मन कुछ और ही सोच गया|

भाभी ने आगे बढ़ कागज का एक पुलिंदा माँ की ओर बढ़ा दिया,"आपकी अमानत" कह माँ के पैर छु लिए|

कागज पकड़ते माँ के हाथ काँप रहे थे| अपनो का घात बहुत बड़ा होता हैं|मन आशंकाओं से घिरा था|

माँ के हाथो से एक तरह से मैंने कागज खींच ही लिए| घर के कागज थे| मैंने अविश्वास से भाभी की ओर देखा|

"मैं एक पाप की भागीदार होने से बच गयी| जब इन्होंने कागज संभाल कर रखने के लिए मुझे दिये थे तब इनके मन के कालेपन को मैं नहीं सूंघ पायी थी| पर कल रात आपकी और माँ की बाते मैंने सुन ली थी| इसलिये आज सबसे पहला काम मैंने यही किया|"

"पर भाई!!!!" मेरा मन अभी भी अविश्वास में घिरा था|

"उनके आगे भी एक बेटा खड़ा हैं|" भाभी के चेहरे पर अरसे बाद मैंने मुस्कान देखी|

आज भी पापा की आँखो से दो बूँद आँसू ढलके| उन्होंने मुझे और भाभी को अपने पास बुलाया| दो उगलियाँ हवा में लहरायी| फिर एक हाथ मेरे और दूसरा हाथ भाभी के सिर पर रख दिया|

उस दिन पितृहीन भाभी के चेहरे पर जो चमक थी वो आज भी मेरे मन में कौंध उठती हैं|

समाज बहू बेटी

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