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मेरी कहानी मेरी ज़ुबानी
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© Bhavna Thaker

Tragedy

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क्या देखते हो ? आप सोचते होंगे क्यूँ एसी हूँ मैं ? नीरस बुझी-बुझी, भई होती होंगी ज़िंदगी आसान कुछ खुशनशीब इंसानों के लिए, ज़िंदगी के सताये हुए में शामिल हूँ साहिब, यहाँ तो दिल के दुर्ग में कोई मोह ज़िंदा ही नहीं, एक अबला बिना किसी ख़्वाहिश की मोहताज, जिसकी ख़्वाबगाह बंजर धरा सी, न सपने पलते है न कोई आस, ज़िंदगी से, इंसानों से, अपनों से, दर्द से, ग़म से सताई गई, बिना कोई हसरत या उमंग के जीती जागती साँसें चलने भर से ज़िंदा कहलाती एक लाश हूँ।

हाँ भूल गई है ज़िंदगी मुझे पैदा तो किया पर लकीरें लिखना भूल गई, साधारण माँ बाप की चार संतानों में दूसरी मैं एकदम सादगी में पली बड़ी, क्या पली बस ठोकरें खाती सिर्फ़ बड़ी हुई, क्या खेलना क्या खाना कुछ नहीं देखा मैंने बस जबसे हाथ पैर नन्हे से थोड़े बड़े हुए घर के काम थमा दिये गये।

एक स्कर्ट थी ब्लू रंग की बस उपर शर्ट्स बदलते थे कभी बड़े भाई के कभी पापा के, हर साल सूखा पड़ता था पानी भरकर लाती थी तीन मील चलकर ना कोई दुःख न था बस हालात ही तंग थे, पापा थे तो सरकारी नौकर पर ६ लोगों का गुज़ारा कोई सहज बात नहीं थी सरकारी स्कूल में पढ़ाई की, पर समय कहाँ था पढ़ाई का रात होते घर काम से थक कर सो जाते थे, देखो आप कहोगे की यही तो ज़िंदगी है बहुतों के साथ होता है।

पर ना पूरी ज़िंदगी तो बदकिस्मती साथ नहीं रहती ना ज़िंदगी को रहम भी आता है तो एक दशक अच्छा भी बितता है, मेरे जैसे करम जले बहुत कम होते होंगे।

न ..न नहीं जताती किसी को अपने दर्द की खराश आज जवाब जो दे दिया मेरी सहेनशक्ति ने, हाँ तो जब ९वीं क्लास में जैसे तैसे पास हुई तो पापा की ट्रान्सफर एक ऐसी जगह हुई जहाँ जवान लड़कियों का रहना मुश्किल था तो मुझे भेज दिया नानाजी के घर पढ़ाई करने, क्या बताऊँ कैसे बीते वो दिन उस ज़माने में माँ बेटी की डिलीवरी साथ होती थी दो मौसी मेरी ही उमर की और दो मामा वहाँ पर भी झमेला और काम का बोझ, क्या पढ़ती नानी की तानाशाही मौसी की दादागीरी, बस चुपके से रो लेती थी रात के अंधेरे में एक तकिया साथी था जिसे दर्द सुनकर गीला करती थी।

कुछ दिन सुख के देखें हाँ कोंपलें फूटी थी दिल में किसी के लिए पहले प्यार की, पर कहते है ना बदकिस्मत को सूखी रोटी भी नसीब कहाँ बस बड़े मामा को पता चल गया ओर मुरझा गया पौधा खिलने से पहले ही,

कहाँ मंज़ूर किस्मत को की कोई फूल खिले मेरी राहों में। जैसे तैसें १०वी पास की ओर आगे पढ़ना भी चाहती थी पर क्या कहूँ साहब यहाँ एक तो मैं लड़की ज़ात, और उपर से जो बड़ा भाई खुद तो पढ़ने में डम्ब था उसने फ़रमान जारी कर दिया की अगर ये कॉलेज जाएगी तो मैं नहीं जाऊँगा, लड़कीयों का कॉलेज जाना ठीक नहीं इसे घर बैठे और जो कुछ करना है करें, सिसक कर सहम कर रह गई किसी ने भी तो साथ ना दिया मेरा।

पापा की ट्रान्सफर होती रहती थी तो माँ हमेशा पापा के पास रहती हम चारों भाई बहन की जिम्मेदारी मेरे उपर रहती पैसों की तंगी के साथ घर काम का बोझ, मानसिक तौर पर हार जाती थी, मानो जीती नहीं थी बस कट रही थी, सोचती रहती की शायद किसी अच्छे घर में शादी होगी तो दिन बदलेंगे, पर ख़ुशियों की लकीरें भी तो होनी चाहिये हाथों में।

पहला ही रिश्ता आया लड़का मेरे से उम्र में ९ साल बड़ा, दिखने में भी साधारण सा घर भी सामान्य बस एक बात सकारात्मक देखी घरवालों ने वो थी उसकी सरकारी नौकरी, पर वो भी कोई बड़ी पोस्ट पर नहीं था बस पी. डबल्यू. डी. में क्लर्क था। मैं उम्र की कच्ची और कल्पनाओं में बसे राजकुमार का इंतज़ार करना चाहती थी सच कहूँ मुझे नहीं पसंद था लड़का पर कहते है ना जोड़े उपर से बनकर आते है, माँ पापा जल्दी से एक जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना चाहते थे कैसी कैसी बातों से आख़िर हाँ कहलवा कर अनमने मन से सगाई कर दी

लड़का स्वभाव से अच्छा था और मैं दिखने मैं उनसे सुंदर थी तो प्यार भी करता था, तो धीरे धीरे मैं स्वीकार करती रही। आप सोच रहे होंगे मेरी बदकिस्मती का अंत आ गया, हाहाहा गलत बदकिस्मती अब शुरु होती है साहब, सिम्पल तरीके से शादी संपन्न हुई ज़माना तो बदल गया था पर कुछ लोगों की सोच नहीं, हाँ मैं महज़ १९ साल की क्या ससुराल क्या मायका फ़र्क ही नहीं पता था, शादी के बाद के कानून से अंजान मुझे घूँघट निकालने को कहा गया मैं सहम गई, नहीं आता था मुझे दो बार गिर गई, पर मेरा जेठ तो इतना कट्टर था इस मामले में की मैं कभी भूल जाती घूँघट ड़ालना तो वो किसी कपड़े से मुँह ढ़क लेते, और दो बातें सुनाते वो अलग से।

पति से भी क्या शिकायत करती पर उसकी एक बात अच्छी थी न वो मुझे कुछ कहते न घरवालों से। एक बात से मैं खुश थी की मेरे पति की नौकरी अहमदाबाद जैसे बड़े शहर में थी तो हम दोनों को वहीं रहना था सबसे दूर, पर ना इतना भी खुश ना होइये दो ननद भी दी थी उपर वाले ने एक सूर्पणखा तो दूसरी मंथरा थी तो दोनों बड़ी अपने ससुराल में पर कुछ लोगों के स्वभाव में होता है न, जीने नहीं दूँगी तू हमसे ज्यादा खुश कैसे रह सकती है। बस कोई न कोई बहाने से आती रहती ओर किसी न किसी बात पर झगड़ा करके रुलाना उनका पेशा बन गया था, मैं खरगोश की तरह थरथराती, ऐसे में मेरी तबीयत खराब रहने लगी छोटी छोटी गांठें गरदन पर दिखाई दी, एक तो उस ज़माने में पगार कोई इतनी बड़ी नहीं थी बड़ा शहर दो लोगों की मुश्किल से कटती थी ऐसे में बिमारी, मेरी माँ को चिंता रहती थी तो कभी थोड़ी मदद मिल जाती हर साल मसाले आचार पापड़ भेज देती, जब मायके जाती तो ५/१० रुपये सबसे छुप कर हाथ पर रख देती बस।

अस्पताल के खर्चे जितना तो वो भी नहीं दे पाती थी। डॉक्टर को दिखाया सब टेस्ट हुए तो टी बी की गाँठ बताया हम दोनों सहम गये पर मुझे फ़क्र है मेरे पति पर की उन्होंने अच्छे से अस्पताल में मेरी ट्रीटमेन्ट करवाई और मेरे साथ खड़े रहे, ओपरेशन हुए लगभग ८ जीतने और कुछ सालों में दो बच्चे भी हुए। उस ज़माने में क्लर्क की कुछ खास पगार ना थी अहमदाबाद जैसा शहर दो बच्चों की परवरिश उपर से मेरी बीमारी के खर्चे और सास ससुर भी साथ रहने आ गये। सही कसौटी अब थी सच में अगर बच्चों का ख़याल ना होता तो पता नहीं कौन सा कदम उठा लेती, बहुत बुरे ख़याल बार बार आते पर ना कुछ करने की हिम्मत थी ना ज़िंदगी जीने की कोई खुशी या वजह,बस ढ़ो रही थी।

पति को साथ देने के लिए कुछ काम करने का सोचा पर ज्यादा पढ़ी भी नहीं थी की कहीं काम माँगने जाती ,

घर बैठे जितना हो सका किया, हर सीज़न की चीज़ें बेची मसाला पापड़ अचार। छोटे बच्चों को संभालने बेबी सिटींग भी किया शरीर साथ नहीं देता था फिर भी किया ताकि बच्चों की हर ख़्वाहिशें पूरी कर सकूँ, सास नरम स्वभाव के थे पर ससुर जी की जो हुकूमी के आगे थर थर काँपती मैं, उपर से दो दो ननद की टार्चर ज़िंदगी जहन्नुम लगती थी कभी।

जेठ जेठानी ने सब कुछ अपने नाम करवा कर सास ससुर को भेज दिया था, फिर भी मेरे संस्कार ने मुझे गलत करने नहीं दिया दोनों की सेवा की जितना बन पड़ा किया, वो तो दोनों बारी बारी चल बसे अब बच्चे बड़े हो गये थे। बेटा बारहवीं में आया टयूशन के लिए पैसे कहाँ से लाती, भारी मन से बेटे को एक दुकान पे काम करने भेजना पड़ा बेचारा काम भी करता और पढ़ता भी, सच मानो तंग हाथ ने बच्चों की करियर खत्म कर दी जैसे तैसे बी.काॅम हुआ ओर प्रायवेट कंपनी में काम पर लग गया, इतने में पतिदेव का रिटायरमेन्ट का वक्त हो चला, कुछ पैसे पी.एफ. के मिले उसमें से एक छोटा सा घर लिया और बाकी दोनों बच्चों की शादी में लगा दिया, मामूली रकम बची जिसकी एफ.डी. करवा ली ताकि बुरे वक्त में काम आ सके। उपर वाले की दुआ और कुछ अच्छे कर्म होंगे की बेटे की बहू बहुत सयानी और सुलझी हुई मिली है घर की परिस्थिति को समझकर चलने वाली ओर सेवाभावी भी, बेटी भी ससुराल में खुश है, मैं इनको बार-बार बोलती हूँ की मुझे हरिद्वार ले चलो बहुत मन है गंगा नहाने का, मैं जानती हूँ तंग हाथ के चलते हर बार बहाना बनाते टाल जाते है खैर तन को नसीब ना सही गंगा बस हड्ड़ीयों को ये सुख मिल जाय बस यही एक इच्छा किए जी रही हूँ।

लगता था अब अच्छी गुज़रेगी बाकी की ज़िंदगी। पर, किस्मत को मेरी ख़ुशियाँ कभी रास ना आई, कभी-कभी सोचती हूँ अगर ज़िंदगी ऐसी है तो ये ज़िंदगी ही क्यूँ है, ज़िंदगी खुद तो जन्म दे के भूल ही गई कभी खबर लेने ना आई, पर हाँ हर कुछ दिन बाद ज़ख़्मों को मेरा पता देना कभी नहीं भूली ख़ुशियाँ तो जाने दो सुकून की भी दुश्मन रही।

दिमागी कसरत से थककर जिस्म खोखला होता चला शुगर जैसी बिमारी ने घेर लिया मुझे, कभी चक्कर तो कभी बदन दर्द वजन कम होता चला, कमज़ोरी, मैं खुद तो कितना कुछ झेल रही थी की उपर से पतिदेव को डिप्रेशन के इतनी हद तक हुमले आने लगे की साइकियाट्रीस का सहारा लेना पड़ा, फिर भी वो निकलने की बजाय खूंपते चले गये इनकी हरकतों को पागलपन कहूँ की बिमारी, समझो दवाईयों के आदि बनते गये कितना समझाऊँ कोई फायदा नहीं।

अस्पताल और दवाईयों के चक्कर में जो बचत होती थी वो भी कम पड़ जाती, कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ, क्या करुँ, बेटा भी प्राइवेट कंपनी में जॅाब कर रहा था इनकी पेन्शन और बेटे की कमाई जोड़कर बस घर चलता है पर ये आये दिन अस्पताल के खर्चे कमर तोड़ देते है। बस कट ही रही थी ज़िंदगी की एक दिन मेरे पति को मेजर हार्ट अटैक आया पैरों तले से ज़मीन ही खिसक गई मेरी। बस एक सहारा था, थी तो मेरी छोटी बहन पर बहन कहूँ, माँ कहूँ, या सबकुछ कहूँ एक वो ही थी बहन जीजा का बड़ा सहारा रहा, आधी रात को इनको अस्पताल लेकर गये डॉक्टर ने बोला एन्जियोग्राम करके बलून बिठाना पड़ेगा दो लाख का खर्च होगा।

मेरा दिल भी बैठता जा रहा था जीजा ने बोला इस वक्त मैं बैठा हूँ पहले डॉक्टर को बोलो इलाज चालू कर दे बाद में देखा जाएगा, ये तो ठीक हो गए पर जो मूड़ी थी पास में वो पाव भर रह गई एक छोटा बीमा कराया था तो कुछ राहत मिली। पर उपर वाले से एक बिनती जरुर करुँगी की जन्म दे तो पैसे की चुटकी भर लकीर भी लिख दे पग पग पैसों, के लिए मोहताज इंसान को तोड़ देता है, हालत बदतर होते जा रहे थे इनकी तबियत दिन ब दिन बिगड़ती चली दिमाग में खून के गठठे जमने लगे तो चक्कर खाके बेहोश हो जाते स्पेशयालिस्ट से इलाज करवाया कुछ दिन ठिक रहा, एक दिन हमारी शादी की सालगिरह थी तो मैं खुश थी, ये भी अभिनय कर रहे थे खुश होने का सोच रहे थे शाम को मंदिर दर्शन करने जाएँगे पर शाम होते ही इनकी तबियत बिगड़ने लगी जल्दी से अस्पताल पहुँचे पर अस्पताल पहुँचते ही इन की बोड़ी के सारे पार्ट्स ने काम करना बंद कर दिया, हार्ट भी साँसें छोड़ रहा था डोक्टर्स भी घबरा गये कितने इंजेक्शन लगाए सीने पर हाथ दबाते रहे,

मुझे कुछ नहीं सुझ रहा था, पास ही मंदिर था बस भगवान के चरणों में लेटकर चिल्लाती रही की आज तो इनकी जान बक्श दे, शादी की सालगिरह के दिन क्यूँ किसी सुहागन को विधवा करने पे तुले हो, क्या रह जाएगी मेरी ज़िंदगी इनके बगैर मन कर रहा था कहीं से ज़लज़ले का बवंडर आए और मुझे बहाकर ले जाये, ख़ाख़ हो जाऊँ में इस वेदना से इस पीड़ा से मुक्ति पा लूँ, मंदिर की चौखट पे सर पटक रही थी की बेटे ने आकर कहा माँ पापा को होश आ रहा है हृदय में धड़कन सुनाई रही है, डॉक्टर ने बुलाया है, आज पहली बार अहसास हुआ की मंदिरों में सिर्फ़ पत्थर ही नहीं कोई शक्ति भी बसती है जो रूह से निकली आर्तनाद सुनती भी है।

दस दिन तक अस्पताल में रहे कितने सारे टेस्ट हुए जान पहचान वालों से कितनी जगह पर मदद के लिए हाथ फैलाए मंदिर तक में ट्रस्टीओं से बात की इधर अस्पताल का बील बढ़ता जा रहा था, अंत मेंडॉक्टर ने बोला इनकी दोनों किड़नी फेल हो चुकी है डायालिसीस पर ले जाना पड़ेगा। एक और ये पहाड़ टूटना बाकी था बिना पैसों के इतना बड़ा इलाज कैसे होगा, भला हो इस सरकार का जिन्होंने महाकार्ड जैसी सुविधा दी है मिनीमम इन्कम वालों को, इश्वर ने इसी समय के लिए सद्बुद्धि दी होगी जो कुछ महीने पहले ही ये कार्ड निकलवाया था और डायालिसीस इसमें फ्री होता है, बस अभी तो इतना निजात मिला है, पर हर दूसरे दिन अस्पताल के धक्के और खून चूसने वाले दलालों से भी बदतर अस्पतालों की पैसों के लिए लालसा देखकर हार गई हूँ ।

मेरा दिल जानता है कैसे निपटी हूँ हर हालातों से आगे का पता नहीं, और कितने घाव झेलने है, पर अब निखर गई हूँ कोहिनूर हीरे सी, ज़िंदगी के थपेड़ों ने टंकण से तराश दिया है।

अब हर ज़ख्म के लिए दरवाज़ा खुला है जब हर हाल में जीना ही है तो डर कैसा, कोई एक समस्या से इंसान लड़ सकता है, पर आर्थिक , शारिरिक, मानसिक तीनों मैदान में निहत्था कैसे लड़े।

उपर वाले से विनती है किसी इंसान का इतना भी इम्तेहान ना लें की टूटने के बाद खड़ा ही ना हो पाए।

जन्म दे तो हाथ में एक हलकी लकीर तकदीर वाली भी लिख दें, वरना नहीं चाहिये जन्म कोई अगर ज़िंदगी का नाम दर्द है तो,

इसीलिए घर में सबको बोलती हूँ की मेरी अस्थियाँ गंगा में बहा देना, ताकि मोक्ष पा लूं हर दर्द से॥

रहम इंतजार पीड़ा

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