प्रकाश स्तंभ श्री पद्मबंध
प्रकाश स्तंभ श्री पद्मबंध
दफ्तर के बाहर एक नाम की तख्ती लगा दी गई .. श्री पद्मबंध ..।
जुम्मा- जुम्मा श्रीपद्मबंध जी ने अभी विद्यालय में नया- नया पदभार संभाला तभी से अनेक चुनौतियों का सामना किया ,पद की गरीमा को बनाना भी एक जीत थी ..।
ब्याह हुए अभी कुछ ही महीने हुए थे ..।
पत्नी बड़े शहर की थी सो उस पिछड़े इलाके में आने से परहेज़ किया, शहर की पढ़ी -लिखी लड़की होने के कारण उनकी पत्नी ने नौकरी का फैसला किया, तब भी आचार्य श्रीपद्मबंध जी ने कभी मना नहीं किया, उन्होंने स्वेच्छा से उन्हें नौकरी करने शहर भेज दिया . .।
श्रीपद्मबंध जी के स्टाफ से उन्हें चपरासी तो मिले, परंतु,वे फिर भी अपने साथ एक निजी नौकर रखना चाहते थे ..।
जब प्रारंभ में एक बार नौकर की आवश्यकता पड़ी तो, उन्होंने गांव से एक गरीब घर के लड़के का ध्यान आया, उन्होंने उसे लाना उचित समझा ..।
वे गांव गए और रिश्ते की चाची के घर जा, पहुंचे..।
उसकी देहरी जाकर साधारण रुप से मन की बात कही ,"--चाची ..! ये मत सोचना मैं नौकर रख रहा हूं, क्योंकि चाचा नहीं हैं तो धन के अभाव में पुत्र आगे कैसे पढ़ेगा ? ये सोच लेना बेटा कुछ बनकर ही आपके घर आएगा ..। गांव में विद्यालय भी चार कोस दूर हैं और पानी के भरोसे खेती होती है ..।इसकी चिंता ना करना ..।मैं इसे अपने संग ले जा रहा हूं ..।"
संत सिंह का कुछ आवश्यक सामान बंधवा लिया और अगले ही दिन संत सिंह को लेकर अपने घर पहुंच गए ..।
संत सिंह को प्रारंभ में आटा मलना, रोटी सेकनी में बहुत दिक्कत आई तो आचार्य श्री जी ने उसे आटा मलना और चूल्हे में रोटी सेंकनी तक सिखाई ..। गोल -गोल से प्यारे फुल्के संत सिंह को बनाने आने लगे थे ..।
साथ- साथ में उन्होंने उसे पढ़ने के लिए उत्साहित किया ..संत सिंह भी आचार्य की देख रेख में पढ़ने लगा था। देखते ही देखते हाईस्कूल और फिर इंटर पास हो गया था । उसी दौरान चपरासी के पद के लिए भर्तियां निकली ।
फिर :
एक दिन अचानक
आचार्य श्री जी ने उसे अपने पास बुलाया, उनके हाथ में एक सरकारी कागजात थे उन्होंने कहा, "--संत सिंह तुमने मेरी बहुत सेवा की और साथ में जीवन के उद्देश्य के प्रति भी तुम्हारी लगन रही है ..। लो तुम्हारा पहला फल जो आज ईश्वर ने तुम्हें दिया है । आज से तुम विद्यालय के हो और मेरे निजी कर्मचारी नहीं ..।"
संत सिंह बोला, "--महोदय आप की छत्रछाया में ही मैं पनपा हूं और आप ही मेरे प्रथम गुरु रहे हैं, आपका मान पिता तुल्य ही है .. इसलिए आपको मैं नहीं भूल सकता, आपकी सेवा मेरा सौभाग्य है ..।"
आचार्य जी ने इतना ही कहा, "--संत सिंह मेरा आशिर्वाद सदैव तुम्हारे साथ ही रहेगा, लेकिन तुम्हें अब विद्यालय की सेवा के लिए नियुक्त किया है ..। अब आज से तुम वहां के कर्मचारी हो ।"
संत सिंह अपने गुरु स्वरूप श्रीपद्मबंध जी के आगे नतमस्तक हुआ ..। श्रीपद्मबंध जी संत सिंह के जीवन नायक बन चुके थे ..।
इसके बाद संत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा, बाबू की भर्ती की परीक्षाओं में भी हाथ आजमाया, अपनी प्रबल इच्छाशक्ति के कारण बाबू के पद पर भी पहुंच गया ..। उसकी सच्ची लगन और आचार्य के प्रति सेवा का फल उसे मिला ..।
श्रीपद्मबंध जी अपने कार्य में ईमानदारी और लगन से दूर दूर गांव में प्रसिद्ध हो रहे थे । उनके नाम का के ढंके बज रहे थे । वे गांव में जाकर अभिवावकों को प्रेरित करते और फिर अभिभावक अपने बच्चों को विद्यालय भेजते ..। उनका विद्यालय भी काफी प्रसिद्ध हो रहा था ..।
पहले विद्यालय प्रांतीय करण था, फिर उनकी सच्ची लगन और निष्ठा से सरकारी बना, इंटरमीडिएट में विज्ञान संकाय नहीं थी, बाद में मेहनत के बल से विज्ञान में रुचि रख रहे विद्यार्थियों के लिए विज्ञान के दरवाजे भी खोले ..। खेल के मैदान से लेकर सभी प्रयोगशालाओं को दुरुस्त किया ..।
दूर दराज छात्रों के निवास के लिए इमारत बनवाई ..। उन इमारतों में लकड़ी का काम करवाया, जब उनके ऊपर छात्र गुजरते थे तो, एक अलग तरह की आवाज होती थी ..।
उस रात कंपकंपाती सर्द रात में :
छात्रों को लगा कि, वे बाहर गए हैं और वे जोर जोर से शोर मचा रहे थे ..तभी दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी सामने देखा श्री पद्मबंध जी, सबकी पैरों के नीचे जमीन खिसक गई वे इतना डर गए, अनुशासनहीनता उन्हें बर्दाश्त नहीं हुई, एक तो सर्द रात, ऊपर से रातभर मुर्गा बनना पड़ा सो अलग ..।
उस रात उन्होंने छात्रों की टोह लेने की सोची, तो श्री पद्मबंध जी दूसरी मंज़िल पर गए किन्तु, वहां उनके कदमों की आवाज ही नहीं हुई ..।
परिक्षाएं शुरू होने को थीं और फ्लाइंग स्क्वॉड के रुप में उनको दूसरे विद्यालय जाना पड़ गया था ..। जब भी कोई कार्य कंधों पर लेते तो ईमानदारी की झलक उसमें मिल जाती ..।
इधर परीक्षा शुरू हुई और उधर उन्होंने एक बच्चे की पेंट पर सिली हुई गुप्त जेब से पर्चियां जब्त कीं, तो किसी बच्चे के मौजे के ऊपर मौजे से, तो किसी बच्चे की चोट पर पट्टी के भीतर से, जूतों की सॉल के नीचे ..।
परीक्षा के बाद उन्होंने कहा, "--आप सब परिक्षाओं में पास होना चाहते हैं लेकिन,पास होने के लिए आप लोगों का तरीका गलत है मैं चाहता तो आप सब को तीन साल के लिए रेस्टिकेट कर सकता था, किंतु, आप लोगों का भविष्य अभी आगे पड़ा हुआ है और इस तरह जल्दी के चक्कर में गर्त में फंस जाओगे..। ध्यान रखो..! जिंदगी शॉर्ट स्टोरी में मत लिखो नहीं तो भविष्य भी शॉर्ट हो जाएगा ।"
ऐसा कह रहे थे और उन नकलची छात्रों के मुंह नीचे की ओर शर्म से डूबे हुए थे..।
सच्चे, निष्ठावान, निष्पक्ष, ईमानदार और कर्तव्यपराण आचार्य रहे ..। श्री पद्मबंध जी अपनी विद्वत्ता और कुशल संचालन के चलते महत्वपूर्ण पदों पर रहे .. प्रदेश सरकार की तरफ से सर्वश्रेष्ठ अध्यापक का पुरस्कार भी मिला ।
आज भी जिस विद्यालय की नींव उन्होंने रखी थी, विद्यालय के छात्र उनके आदर्शों पर चलने के लिए प्रेरित रहते हैं ..।
प्रकाशस्तंभ की तरह श्री पद्मबंध जी ने हजारों शिक्षकों और बच्चों को अपना सानिध्य दिया ..। आज भले ही वे दुनिया में नहीं हैं परंतु, उनकी दी हुई शिक्षा की इमारत मजबूत है वह कभी नहीं ढह सकती ।
बिशन ने यह प्रेरक कहानी अपने बढ़ते हुए बच्चों को सुनाई । जो आज विद्यालय में बड़े बाबू के पद पर है ..।
बिशन ने बस अपने किरदार का नाम बदल दिया था ..वह संत ही था ..श्री पद्मबंध जी का पुराना नौकर ..।
