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Sandeep Panwar

Abstract

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Sandeep Panwar

Abstract

मालूम नहीं

मालूम नहीं

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ये कैसी दुविधा है 

तुझे देख कर कुछ अपना 

सा लगता है ऐसा लगता है 

हम साथ है कई जन्मों से,


मेरे सामने होते हुए भी

तू बहुत दूर है मुझसे

ऐसा महसूस हो रहा है

कि तू धरती है और


मैं आसमान जो

आमने सामने

होते हुए भी 

कभी मिल नहीं सकते

ये कैसी कशमाकश है

 

तेरे मेरे बीच तू उस बेगानी 

बरसात की तरह है जिसमे 

पूरा जहा तो भीगता है पर मैं नहीं,

तू उस बेगाने आईने की तरह है


क्योंकि मैं जब भी तुझे 

देखता हूँ मुझे बस अपने ही 

जज्बात दिखाई देते हैं,

ये कैसी कशमाकश है 


तेरे मेरे बीच मालूम नहीं

कुछ कहानियाँ बयान

करने के लिए नहीं होती

उन्हें अनकही ही रखा 

जाए तो अच्छा होता है।


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