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V. Aaradhyaa

Romance

3  

V. Aaradhyaa

Romance

आकाश का घर

आकाश का घर

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लड़ गई मैं उनसे एक दिन

तुम जो मुझे चाँद कहते हो

वो झूठ मूठ का कहते हो,

ज़रा चाँद का घर देखो

इतना बड़ा आकाश है सोचो,

मेरा घर भी क्या घर है

इसमें कमरे भी कितने कम हैं!

सुनकर मेरे वो हँसते हुए बोले

अरे पगली, क्यूँ खामखा रोती है,

तेरा घर है मेरा चौड़ा सीना

जिसपे तू अपना सर रखकर

बड़े सुकून से सोती है।


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