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Bhawna Kukreti Pandey

Abstract

4  

Bhawna Kukreti Pandey

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कुदरत

कुदरत

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क्या

इक विषाणु से

समय रुक गया है!

कुदरत का चाबुक

पूरा चल गया है।


नहीं

ऐसा नहीं है ,

वो वैसा ही दौड़ रहा है ,

सिर्फ हम बेहद सहम गए हैं,

घरों में छुप कर दुबक गए है।


कुदरत से

सबने छेड़ की है,

तो उसने भी आंखें फेर ली हैं,

समझो यारों अब संभल जाना है,

कुदरत से हर पल प्यार जताना है।


कुदरत की

सीरत है माँ सरीखी,

सब भूल कर वो माफ कर देगी,

सिर्फ हमें उसकी सीख याद रखना है,

मिलकर फिर कुदरत को संवार देना है।


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