कुछ मन की बातें
कुछ मन की बातें
कुछ मन की बातें.....
कुछ तन की बातें....
इन्हें लिखना चाहती हूँ ....
लेकिन मन की बातें और तन की बातें
लिखना क्या आसान है?
मन की बातें लिखने पर तो बवंडर होंगे
क्योंकि वे तन की बात भी कहेंगे......
तन!
हाँ, हाँ, तन!!
वही जिसमें मन बसता है....
मन की बात तो मन जानता है.....
तन की बातों को मन क्यों जाने भला?
तन की बातों को वह क्यों माने भला?
तन फिर क्या करे ?
तन फिर विद्रोह पर उतर आता है...
उसे सिर्फ एक दूसरे तन की ज़रूरत होती है !
तन अपनी चाह के लिए दूसरा तन ढूँढने लगता है ....
एक दूसरा तन!!
जो उसे साथ दे....
उसकी गंध को महसूस कर उसे साथ दे....
उसके स्पर्श को प्रतिसाद दे....
उस वक़्त तन बेलगाम हो जाता है.....
अपनी उस वक़्त की जरूरत के लिए...
वह दूसरे तन को छीनना चाहता है....
और उसे हासिल करके ही मानता है.....
तन क्या जाने नैतिक और अनैतिक?
तन तो बस अपनी भूख जानता है...
भूख की कैसी अनैतिकता?
यह नैतिक और अनैतिक तो मन की बातें होती है...
तन की भूख को मन फिर जस्टिफाई करने लगता है.....
कई तरीके से.....
ढेरों कारणों से .....
स्त्री भोग्या है....
और उसके जैसे शक्तिशाली पुरुष ने भोग लगाया है....
वह अपने पौरुष की पताका लहराने लगता है.....
भूख़ में क्या सही क्या ग़लत?
उसके लिए तो सब सही और नैतिक ही है .....
और जो नैतिक है वही तो संस्कृति रक्षक भी है......
बलात्कारी ?
अरे नहीं !!!
उस दूसरे तन पर तो उसी का अधिकार था....
सिर्फ उसके तन का !!!!
ये मन, वन, नैतिक या अनैतिक कुछ नहीं होता है
ये सब अफ़वाहें होती है.....
