Audio

Forum

Read

Contests

Language


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
बस तुम चली आओ
बस तुम चली आओ
★★★★★

© Ashish Vairagyee

Romance

1 Minutes   14.4K    9


Content Ranking

ये अजीब इत्तेफ़ाक है

तुम होकर भी नहीं हो

और मैं मौज़ूद होकर भी

अकेला हूँ अपने आप में

मेरी हर सांस में गरमाहट है

तो तुम्हारे अहसास की

और तुम सन्नाटे की वज़ह हो

मेरे हर ख्यालात की

मैं महसूस कर लेता हूँ तुम्हें

मगर देख नहीं सकता

बात कह लेता हूँ तुमसे

मगर तुम सुन नहीं पाती

आँसू इस फ़िराक में आते है

कि तुम आओगी और उन्हें पोंछोगी

और दरवाज़े वैसे ही खुले रहते है

जैसे मैं उन्हें खुला छोड़ के आता हूँ।

खिड़कियाँ जालो से ऐसे टिकी हैं

मानो डाली दरख़्त से बस टूटने को हो

क़ालीन भर रहा है अपनी आखिरी साँस

और पर्दे अपनी आबरू बचाने में लगे है

तुम्हारे होने से ये मकान घर लगता था कभी

अब तो ज़ख्मों के टाँके खोले राह देखता है

नुमाइश लगाए है अपनी की तुम आओगी

मैं बयान नहीं कर पाता दर्द अपना 

और तुम हो कि देखने को राज़ी नहीं

चली आओ इस बहाने से की मैं हूँ ही नहीं

उन दरवाज़ों को बंद करने

उन खिड़कियों को खोलने 

उन पर्दों को सवारने, क़ालीन पर चलने

इस मकान को घर बनाने

एक आखिरी बार चली आओ....

महसूस आंसू एहसास

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..